ताज़ा रेजगारी

बैठ के बालकनी में मौसम गाये एक ग़ज़ल

जीने का ढब कुछ दिन को इतना आवारा हो
अजनबी पहाड़ी रस्ता हो, पानी का धारा हो

वक्त नदी की लहरों में कुछ देर ठहर जाए
डूब रही उम्मीदों को तिनके का सहारा हो

जल्दीबाजी, शोर-शराबा सबकी छुट्टी कर
खुला हुआ आकाश हो और एक टूटता तारा हो

रुपया-पैसा, बटुवा, सबकुछ एक किनारे रख
मनमर्जी के सिक्कों से जीवन का गुज़ारा हों

तितली आँख मिचोली खेले हवा के आंगन में
दूर कहीं मीठी लय में बजता इकतारा हो

बैठ के बालकनी में मौसम गाये एक ग़ज़ल
हल्की सी बारिश हो उसपे साथ तुम्हारा हो

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