ताज़ा रेजगारी

बेकायदे का प्यार

कभी कभी मन करता है
सब यहां-वहां सा हो जाए
तितर-बितर एकदम
कुछ भी न रहे करीने से

सुबह-दिन-शाम-रात बन जाए
सुबह-रात-दिन-शाम या फिर
दिन-सुबह-रात-शाम
सर्दियों के बीच गर्मियां होने लगें
बारिशें धूप के ऊपर गिरने लगें
टप-टप

बोलना सुनाई देने का मोहताज न रहे
शहर में गाड़ियों की जगह गाय-बकरियां तैरने लगें
पंखों की मशीनी कर्कश आवाज़ को निचोड़ने पर
बाल्टी में भरने लगे ग़ुलाम अली की ग़ज़ल

आकाश आर्ट बुक हो जाए
जिसमें सूरज को थोड़ा खिसकाकर
उसमें भर दिया जाए बैगनी रंग
और उसके बीच में रख दिया जाए कोई देश – जैसे इंडिया
इटली की कुछ गलियां खिसकाकर
रख दी जाएं ताजमहल के ठीक बगल में
और चीन की दीवार पे चढ़के झांकने पर
दिखाई देने लगे आने वाले कल के कुछ-कुछ हिस्से

टीवी के रिमोट से बदलने लगे मूड
मुस्कुराने पर आने लगे रोने की आवाज़
और रोने पर जो मर्जी वो हो

नियम-कायदे-क़ानून किसी पुराने अखबार की तरह
रद्दी में बदल जाएं
उन्हें कुतर दें ख्यालों के फुदकते हुए चूहे

और मेरे इन उटपटांग खयाली पुलाओं में तुम्हें आये स्वाद
तुम ये सब सुनो और हंस दो खिलखिलाकर
हमारे बीच फिर हो बेकायदे का प्यार …

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