ताज़ा रेजगारी

बिसराया गांव सोचता है, मैं भी तो कभी तो रखवाला था

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फोटो : उमेश पन्त

नदी किनारे एक घर था, जिसकी कुंडी पर ताला था
एक टूटी सी छत थी जिसपर, खालीपन का जाला था

एक गाँव नाम की कविता थी, जो धीरे धीरे मिटती रही
और दूर कहीं वीराने में एक सूरज डूबने वाला था

पहले टूटे परिवार वहां, फिर बाखलिया वीरान हुई
फिर वो दीवार भी दरक गई जिसने बरसों से संभाला था

पाथर वाली काली छत पर भुट्टे के बीज उदास से थे
आँगन में पडा सिल-बट्टा भी जैसे बस रोने वाला था

शाम ढले उस झूले पर एक बचपन झूला करता था
एक दौर था जब ये झुका-झुका सा पेड़ भी किस्मतवाला था

उस रोशनदान की सीकों को कबसे हाथों ने नहीं छुआ
कमरे के भीतर बचा-खुचा बूढ़ा बेरंग उजाला था

वो कौन था जिसने छोड़ दिया, वो कहाँ है जो फिर ना आया
बिसराया गांव सोचता है, मैं भी तो कभी तो रखवाला था

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