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बांधों का विरोध करते फिल्मकार और फिल्में

बड़े बांधों को बनाये जाने को लेकर दुनिया भर में चर्चाएं हो रही हैं। विश्वभर में कुलमिलाकर 47665 छोटे बड़े बांध हैं जिनमें से सबसे ज्यादा 22 हजार बांध चीन मे, 6600 से ज्यादा बांध संयुक्त राज्य अमेरिका और उसके बाद 4291 बांध भारत में हैं। लेकिन अब इन बांधों को लेकर बड़े बड़े आन्दोलन ही खड़े नहीं हो रहे बल्कि इस विशय पर वृत्तचित्र और फिल्में भी बन रही हैं। इससे साफ जाहिर होता है कि अंधाधुृध औघोगिकीकरण के चलते किये जा रहे बांधों के निर्माण के प्रति विश्वभर में प्रतिरोध पनप रहा है।

मशहूर फिल्म निर्देशक जेम्स कैमरुन जिन्हें हालिया उनकी निर्देशित फिल्म अवतार के लिये बड़ी प्रसिद्धि मिली है, इस बीच बांधों से होने वाले नुकसान का विरोध करते देखे गये। कैमरुन डाक्यूमेंट्री फिल्म मेकिंग में भी एक बड़ा नाम हैं। इस बार वो अवतार की कास्ट के साथ अमेजन नदी पर बन रहे बैलो मोंट डैम की खिलाफत करने डैम से प्रभावित आदिवासियों के पास उनके समर्थन में पहुंचे। यह बांध 2015 तक काम करने लगेगा। लेकिन विश्व के बांकी हिस्सों की तरह वहां भी आदिवासी इसका विरोध कर रहे हैं। 13 जनजातियों के नेताओं ने मिलकर ये फैसला किया है कि वो इस बांध को न बनने देने के लिये हर संभव प्रयास करेंगे। उनका कहना है कि यदि अमेजन की उपनदी शिंजू पर यह बांध बना दिया गया तो उनके मछली के व्यवसाय का क्या होगा। साथ ही इस नदी के सूख जाने से उनके लिये यातायात की समस्या भी पैदा हो जायेगी। जेम्स कैमरुन का इस पर कहना है कि इस बांध के मसले पर पूरे विश्व समुदाय को एकजुट होना चाहिये क्योंकि अन्ततह इसका प्रभाव पूरी दुनिया पर पड़ेगा।

दूसरी ओर फिल्मकार सोहन राय निर्देशित एक फिल्म डैम 999 भी रिलीज होने वाली है। इस फिल्म में बांधों के टूट जाने की वजह से होने वाली त्रासदी की दास्तान फिल्माई गई है। हांलाकि फिल्म में बांधों का टूटना एक प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति के तौर पर भी प्रयोग किया गया है। फिल्म की बैबसाईट में चीन में बांधों की वजह से हुई त्रासदी को फिल्म की प्रेरणा होने की बात लिखी गई है।

बांधों को लेकर चीन का रवैयया उसके पड़ौसी लाओस और थाईलैंड दोनों के लिये ही चिन्ता का सबब बनता रहा है। मेकांग नदी के उदगम स्थान पर बड़े बड़े बांधों का निर्माण कर चीन ने लाओस और तिब्बत दोनों संकट में डाल दिया है। क्योंकि मेकांग का पानी ही वह जरिया था जिससे लाओस में बिजली उत्पादन सम्भव हो पाता था और लाओस यह उत्पादित बिजली थाईलेंड को बेचकर उसकी बिजली की आपूर्ति करता था। लेकिन चीन ने बांध बनाकर इस पानी को रोक दिया है। चीन बांधों के जरिये इन देशों को पहले भी परेशान करता रहा है। बरसात के मौसम में चीन इन बांधों को खोल देता रहा है जिससे लाओस, कम्बोडिया, थाईलैंड और वियतनाम के कई इलाकों में बाढ़ का संकट उत्पन्न होता रहा है। यही शैतानी चीन अब भारत के साथ भी कर रहा है। ब्रहमपुत्र नदी के पानी को मोड़कर चीन अपने देश में सूखे के संकट से बचना चाहता है। लेकिन इससे असम सहित भारत के कई उत्तरपूर्वी इलाके सूखे की कगार पर आ जायेंगे।

इसी तरह चिली के पैंटागोनिया में दो नदियों पर पांच बांध बनाने के लिये कई कम्पनियों ने प्रस्ताव दिये हैं। लेकिन वहां भी इन बांधेंा का विरोध हो रहा है जिसकी वजह ये है कि इन बांधों को बनाने के लिये 1500 मील लम्बी ट्रांसमिशन लाईन्स खोदने की जरुरत होगी। जिसके कारण अब तक दुनिया के सबसे विस्त्रृत जंगली इलाके का कटान करना होगा। चिली के होम डीपो इसका विरोध कर रहे हैं क्योंकि ये हर साल इन जंगलों से 50 मिलियन यू एस डौलर कीमत की लकड़ियां विभिन्न उत्पादों को बनाने के लिये खरीदते हैं। कभी रसिया के सबसे बड़े हाईड्रोलिक पावर प्लांट में विस्फोट की वजह से 62 लोगों की मौत तो कभी साईबेरिया में इसी तरह के विस्फोट से 50 से ज्यादा जानें जाने की घटना, बड़े बांधों के दुष्प्रभाव समय समय पर सामने आते रहे हैं। इसके अतिरिक्त पर्यावरणविद भी समय समय पर बांधों की वजह से हो रहे पारथितिकीय नुकसान की ओर ध्यान दिलाते रहे हैं।

भारत में बड़े बांधों के विरोध के स्वर देश के कई हिस्सों से उभर कर आ रहे है हैं। उत्तराखंड में काली नदी पर प्रस्तावित पंचेश्वर बांध का वहां के लोग पुरजोर विरोध कर रहे हैं। इस बांध के बनने से भारत और नेपाल के कुल मिलाकर एक सौ पचास गांव विस्थापन को मजबूर हो जायेंगे। इतनी बड़ी संख्या में विस्थापन का दंश झेलने के बनिस्पत इस बांध का निर्माण डूब के क्षेत्र में आने वाली जनता को रास नहीं आ रहा। इससे पहले टिहरी बांध की त्रासदी को वहां के लोग अब तक नहीं भुला पाये हैं। उर्जा प्रदेश कहे जाने वाले उत्तराखंड से बांधों के लिये आ रहे विरोध के स्वर बताते हैं कि आम आदमी बड़े बांधों का पक्षधर नहीं है। इससे पहले मेधा पाटकर के नेतृत्व में गुजरात की जनता ने सरदार सरोवर बांध का भारी विरोध किया था। गुजरात में नर्मदा नदी घाटी परियोजना के तहत नर्मदा नदी पर 30 बड़े, 135 मध्यम और 3000 लघु आकार के बांध बनाये जाने की योजना थी। इस पूरी योजना में एक लाख लोगों को विस्थापन का दंश झेलने को विवश होना तय था जिनमें 60 प्रतिशत जनजातीय इलाकों के लोग थे। ऐसे में इन बांधों का विरोध होना तय था।

ल्ेाकिन जिस तरह वैश्विक स्तर पर इन बड़े बांधों का विरोध हो रहा है उससे उर्जा के वैकल्पिक स्रोतों की आवश्यकता का मुददा भी सामने आया है। सवाल यह है कि क्या बांधों के समानान्तर उर्जा के दूसरे वैकल्पिक स्रोत विश्वभर में जरुरी उर्जा की आपूर्ति करने में सक्षम हैं। जर्मनी जैसे कितने देश हैं जहां पानी से उर्जा उत्पादन की जगह पवन उर्जा पैदा करने को प्राथमिकता दी जाती है? वहां कुल उत्पादित उर्जा का केवल 3 दशमलव 5 प्रतिशत हाईड्रोलिक पावर के जरिये पैदा किया जाता है। जर्मनी और स्पेन में फोटोवोल्टिक उर्जा प्लांट का प्रचलन भी तेजी से बड़ रहा है। वैकल्पिक उर्जा के स्रोत जिनमें सौर उर्जा, पवन उर्जा तथा समुद्री ज्वार भाटों से उत्पन्न होने वाली उर्जा शामिल है का प्रचलन विश्वभर में बढ़ा है। 2008 में वैकल्पिक उर्जा के इन स्रोतों का कुल उत्पादित उर्जा का 18 प्रतिशत उत्पन्न करने में योगदान रहा। वैकल्पिक उर्जा के स्रोतों से विश्वभर में 2006 में 207 जीडब्लुई उर्जा का उत्पादन किया गया जो 2008 में बढ़कर 280 जीडब्लुई तक पहुंच गया। बांधों के विकल्प पूरी तरह तलाश पाना भले ही सम्भव न हो पर इस मात्रा को धीरे धीरे बढ़ाकर ही कम से कम बांधों के निर्माण की गति को रोका तो जा ही सकता है। जिससे कि उर्जा के स्रोत महज उर्जा का उत्पादन ही करें भारी प्रतिरोध का नहीं।

यह लेख दैनिक भास्कर में भी प्रकाशित हो चुका है।

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1 Comment on "बांधों का विरोध करते फिल्मकार और फिल्में"

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डॉ .अनुराग
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शुक्रिया आपने मुझे एक खजाने की चाभी दी है .हिंदी में विजय आनंद की नीचा नगर भी क्या इसी केटगरी में आती है ?