ताज़ा रेजगारी

बर्फी के साथ- ‘चल भटक ले ना बांवरे’….

आपके जीवन में जब कविताएं घट रही होती हैं, जिन्हें महसूसने के लिये आपको शब्दों के सहारे की ज़रुरत नहीं पड़ती, जब दिखाई देता हुआ और सुनाई देता हुआ भी अर्थहीन हो जाता है, कुछ बेवजह सा, बेनाम सा होता है जो दिल पे गहरी छाप छोड़ जाता है, जैसे ताजे ताजे फाहों वाली बर्फ गिर रही हो, जैसे हौले हौले से बारिश हो रही हो, जैसे नीले आसमान में बादल कोई टुकड़ा खामोशी से रैंग रहा हो, जैसे आप इन सारी घटनाओं के घटने में कहीं शामिल ही न हों, वो सब कहीं दूर बस इसीलिये हो रहा हो कि आपको अच्छा लगता रहे, और कुछ समय बाद वो सब गायब हो जाये, जो रह जाये वो बस उसका एक सुखदाई सा असर हो, जो बस इसलिये हो कि आप उसे अपने दिल के किसी कोने में बने अच्छे अहसासों के खज़ाने में शामिल कर लें। बर्फी एक वैसी ही कविता है जो परदे से गुजरती आपके दिल में घट जाती है।
उस क्लौटावर की घड़ी को पीछे करने के बहाने से बर्फी जैसे हमारी भावनाओं के दायरों को कई गुना आगे कर देती है। वो प्यार जो निस्वार्थ भाव से अपने चाहने वाले के साथ रहना चाहता है। वो प्यार जो वक्त के साथ मीठी सी छेड़खानी करके कह दिये जाने को एक बार फिर से अनकहा कर देना चाहता है। बयां हो जाना भर जहां गुस्ताखी हो जाता है, और गुस्ताखी को वक्त के उस हिस्से से मिटा देने की वो प्यारी सी कोशिश, इतनी मासूमियत लिये वो बर्फी का प्यार।
एक ऐसी फिल्म जहां शब्द बेमायने हो जाते हैं, कहना, सुनना भी मायने नहीं रखता और भावनाएं इतनी उपर उठ जाती हैं कि उन्हें समझने के लिये इशारे और प्रतीक ही काफी होते हैं। वो जूता जो किसी खिड़की के बगल से हवा में गुजरता हुआ पास होने का अहसास करा देता है। वो स्ट्रीट लैंप का खम्भा जो जब गिरता है तो भरोसे और मजबूती से खड़े हो जाया करते हैं। वो साईन बोर्ड जो वक्त के साथ बदल जाते हैं पर भावनाएं नहीं बदलती। वो मौत जो चैन भरी नशीली नीद के पड़ौस से गुजर जाती है, बिना दर्द दिये। वो बुलबुलों में कैद जुगनू जिनकी मद्धम सी चमक में अपनेपन की रोशनी झलक आती है, वो उंगली जो हथेली से जुड़कर जिन्दगी भर के रिश्ते बना लेती है।
फिल्म में कई लमहे हैं जहां आप थम जाया करते हैं। लमहे जो गुदगुदाते हुए आंखों को नम किये जाते हैं। और भीतर कहीं एक अच्छा सा प्यारा सा अहसास भर जाते हैं। मर्फी जब अपना नाम बताते हुए बफफी कहता है तो आप उसके इस कहनेपन के लिये फिदा हो जाते हैं। मर्फी के जाने के बाद जब झिलमिल बर्फी बर्फी चिल्लाती हुई बस का पीछा करते हुए उस तक पहुंचती हैं तो उस सच्चे से प्यार पे न जाने क्यों पर देखने वाले को फक्र होने लगता है।
दाज्यू का अपनी चहेती झिलमिल के लिये इतना प्यार कि वो छल करके भी उसे अपने से दूर नहीं जाने देना चाहते। वो छल भी खलता नहीं है।
स्रुति जिसे बहुत देर से समझ आता है कि जब प्यार किया जाता है तो फिर रुपया, पैसा जैसी चीजें कहीं दूर छूट जाती हैं। मां की नसीहतें तब खोखली लगने लगती हैं क्योंकि मां तब जो कह रही होती है उसे खुद वो दिल से मान कहां रही होती है? इलीना यानी दार्जिलिंग की वादियों में आई वो बंगाली लड़की कहानी के हर हिस्से में, और कहानी के साथ बदली अपनी हर उम्र में उतनी ही सहज और सुन्दर लगती हैं। फिल्म के अंत में उनको दिये गये बहुत खराब मेकअप को छोड़ दिया जाये तो उनका किरदार हर जगह अपनी शालीनता भरी खूबसूरती बर्करार रखता है। एक लड़की जो प्यार करती है, अपनी मां की नसीहतों से थोड़ा डगमगाती है, फिर एक फैसला करती है, लेकिन आंखिर में अपने सामने घटते बर्फी और झिलमिल के अनकहे और अदभुत प्यार के लिये अपनी चाहत को न्यौछावर कर देती है। यही उस किरदार की खूबसूरती है जो समझाती है कि सिर्फ हासिल कर लिया जाना ही प्यार नहीं है।
रणबीर कपूर ने रौकस्टार के बाद एक बार फिर इस फिल्म में साबित कर दिया कि वो भारतीय सिनेमा के आने वाले नायक हैं। एक नायक जो खुद को साबित करने के लिये मीडिया पब्लिसिटी का मोहताज नहीं है। जो अपनी अदाकारी के हुनर से लोगों के दिल और दिमाग दोनों में छा जाने की काबिलियत रखता है। रणबीर के साथ सबसे अच्छी बात ये है कि वो स्क्रीन पर रणबीर नहीं लगते, उनका अपना व्यक्तित्व उनको दिये गये रोल पर हावी नहीं होता। वो अपने रोल के मुताबिक ढ़लना जानते हैं शायद इसीलिये आने वाला वक्त उन्हें एक अच्छे एक्टर के रुप में जानेगा। बाकियों की तरह बस एक बड़े स्टार की तरह नहीं।
प्रियंका चोपड़ा ने भी इस फिल्म में एक औटिस्टिक के तौर पर अपने किरदार को बखूबी निभाया है। उसके किरदार में जो असहजता है वो मासूमियत के ज्यादा करीब है, इसलिये मोह लेती है। थोड़ी सी झिझक, थोड़ा बचपना, थोड़ा चुलबुलापन, थोड़ा सा गुस्सा और बहुत सारा प्यार जो अभिव्क्ति के परे है,   इन सारी बातों को खुद में समेटे झिलमिल का किरदार भी एक यादगार किरदार बन जाता है। हांलाकि फिल्म में उस पूरे किरदार को जिस कहानी के साथ पिरोया गया है वो उतनी प्रभावी नहीं लगती। दिल के मरीज अपने पिता के इलाज के लिये मर्फी का झिलमिल को किडनैप करना और उससे पैदा हुआ कन्फयूजन बस इसलिये पच जाता है क्योंकि फिल्म के स्क्रीनप्ले में उसे बेहतरीन तरीके से ढ़ाल दिया गया है। यहां लगता है कि एक कमज़ोर कहानी को इस तरह खूबसूरती से पिरोया गया है कि उसकी कमजोरी को ढ़का जा सके।
शौरभ शुक्ला, यानि एक पुलिस वाला जो हमेशा मर्फी को पकड़ने की कोशिशें करता रहा पर कभी पकड़ नहीं पाया। कहानी के सबप्लौट के तौर पर ये हिस्सा भी कोई खास प्रभावशाली नहीं है, पर उस पूरी चेज़ से जो हयूमर उपजता है वो फिल्म में अपनी भूमिका बखूबी निभा ले जाता है। खासकर चार्ली चैप्लिन को टिब्यूट देते हुए उनके हावभावों को जिस तरह से रणबीर ने अपनाया है वो इस पूरे सबप्लौट में जान फूंकने का काम करता है।
पूरी फिल्म में जो किरदार सबसे मजबूती और खूबसूरती से खड़ा दिखाई देता है वो है कैमरा। इस फिल्म के सिनोमेटोग्राफर रवि वर्मन का कैमरा जैसे फ्रेम दर फ्रेम कोई पेंटिंग बनाता जाता हो। दार्जिलिंग की वादियों से गुजरता, कलकत्ता की गलियों में घूमता उनका कैमरा जैसे दृश्यों के ज़रिये कोई कविता कहता चला जाता हो। फिल्म जब खत्म होती हैं तो कहानी एक किनारे रह जाती है और आपके दिमागी परदे पर कई दृश्य मडराने लगते हैं। फिल्म खत्म हो जाती है फिर भी वो अनुभव खत्म नहीं होते जो आपने अभी अभी परदे पर देखे और फलतह जिये भी हैं। वो साईकिल जो ट्रेन के बगल में चलते चलते गिर जाया करती है, वो पोल जो बार बार गिरकर भरोसे की परीक्षाएं लेता है, वो तितली जिसे एक उंगली पकड़ने की कोशिश करती है, वो अटपटा सा डांस जो मोह लेता है, वो दुनिया जो बार बार उल्टी दिखने लगती है, वो जूता जो खिड़कियों के पास से गुजरते आसमानी रास्तों पर उड़ता हुआ एक जोड़ी आखों की नज़र में आने की कोशिशें करता है। और भी बहुत कुछ है जो बहुत देर तक याद रह जाता है।
फिल्म समय के जिन तीन हिस्सों में एक साथ जीती है और समय के उन अलग अलग हिस्सों को किसी जिक्शापजल की तरह जिस तरह बार बार जोड़ती तोड़ती है वो काबिले तारीफ है। 1972, 1978 और वर्तमान के वो तीन हिस्से आपस में बहुत सावधानी से गुंथे गये हैं, और उन हिस्सों के जुड़ने में जो कन्फयूजन की सम्भावना हो सकती थी उसे नरेशन का टूल यूज़ करके बड़ी होशियारी से खत्म किया गया है। इस तरह पूरी फिल्म में अनुराग बासू के निर्देशन के साथ साथ उनकी इंटेलिजेन्ट राईटिंग भी प्रभावित करती है।
पूरी फिल्म बिम्बों के सहारे अपनी बातें कहती है। क्योंकि बोली गई बातों से कही ज्यादा, महसूस की गई बातें आपको गहराई से प्रभावित करती है, सुने हुए से, अनुभव किये हुए का असर कई ज्यादा होता है, इसीलिये फिल्म का असर कई गुना बढ़ जाता है। क्योंकि फिल्म का मुख्य किरदार बोल नहीं सकता, न सुन सकता है इसलिये उसके नज़रिये से दुनिया को देखना फिल्म में अहम हो जाता है। बिना संवादों के वो बात कहना जो किरदार कहना चाहता है, फिल्म की सबसे बड़ी खासियत में से एक है। सबसे अच्छी बात ये है कि न सुन पाने और न बोल पाने की वो लाचारी फिल्म में कहीं नहीं दिखती। फिल्म में वो किरदार इतना जीवंत है कि उस किरदार की पहचान उसका नाम तक गैरज़रुरी लगने लगता है। मर्फी जब दूसरों के लिये बर्फी हो जाता है तो भी  उसे कोई खास फर्क नहीं पड़ता।
बर्फी के गीत  आपकी ज़बान पर नहीं बल्कि दिल पर चढ़ने वाले गीत हैं। खासकर ‘फिर ले आया दिल’, ‘सांवली रात’ और ‘क्यों’। प्रीतम का संगीत इस फिल्म में अपनी अलग उपस्थिति दर्ज कराता है और फिल्म के फील को बनाये रखने में भरपूर मदद करता है।
मौजूदा बालिवुड फिल्मों की निराश करने वाली लम्बी लिस्ट में बर्फी बिलकुल अलग से दिखाई दे जाने वाली फिल्म है। एक ऐसी फिल्म जिसे देखना इतना सुखदाई है कि आप उसकी कमियों को छुपाने में एक दर्शक के तौर पर भी निर्देशक के साथ खड़े दिखाई देते हैं। अनुराग बासू की बनाई इस बर्फी में कोमल से, मासूम से इन्सानी अहसासों का जो मीठा स्वाद है वो आपके ज़ेहन में जब भी आयेगा, आपको गुदगुदायेगा और एक अच्छा सा बेनाम सा अहसास आपको महसूस कराकर चला जाएगा।

Comments

comments

Leave a Reply

2 Comments on "बर्फी के साथ- ‘चल भटक ले ना बांवरे’…."

Notify of
avatar
Sort by:   newest | oldest | most voted
ravi prakash
Guest

badhiya likha hai dost…

KK
Guest

bahut hi sundar

wpDiscuz