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बदतर होते ये सरकारी स्कूल


जामिया के एमसीआरसी में उस दिन एक अजीब वाकया सुनने को मिला। सुनकर सभी चैंके। और एक अजीब वितृष्णा से मन भर उठा। फस्र्ट ईयर के कुछ छात्रों ने बताया कि उनकी क्लास की एक लड़की को भरतनगर के सरकारी स्कूल के लड़कों ने स्कूल कैंपस में मोलेस्ट किया है। दिल्ली के सरकारी स्कूल। सुनकर जो छवि अब तक बनती रही थी वो यही थी कि सफेद कमीज और नीली पैंट पहने जो लड़के बसों में बुरी तरह लटकते हुए कन्डक्टरों की गालियां खाते और प्रतिक्रिया में उन्हें और बुरी तरह गरियाते रोज दिखते हैं वो इन्हीं स्कूलों के हैं। आये दिन स्टाप पर रुकी बसों के शीशे तोड़ते, कन्टकटरों की पिटाई करते और आती जाती लड़कियों पर फबतियां कसते ये लड़के। छोटी से छोटी उम्र का लड़का गालियों को बड़े लच्छेदार तरीके से बोलने में एक्सपर्ट। और इस बार इन सारी छवियों पर भारी ये खबर।

दिल्ली के सरकारी स्कूलों की ये छवि केवल आते जाते सफर करते बनी थीै। स्कूल के अन्दर का माहौल देखने को नहीं मिला था। लेकिन इस घटना या कहें दुर्घटना के बाद जिसमें स्कूल के लगभग 100 छात्रों ने स्कूल के अन्दर उस छात्रा के साथ दुव्र्यवहार करने की कोशिश की स्कूल के माहौल की कलई भी खोल दी। हो सकता है सरकारी स्कूलों के बारे में छवि बनाने का ये तरीका गलत हो पर स्कूलों के कमोवेश यही हालात हैं। ऐसा सब जानते हैं। लेकिन उस दिल्ली में जहां एक ओर पब्लिक स्कूल अपने बच्चों को कोन्वेंट कल्चर देकर बेहद सोफिस्टिकेटेड बना दे रहे हैं वहीं दूसरी ओर ये कैसे बच्चों की खेप तैयार हो रही है। ये हमारे देश में सरकारी और निजी संस्थानों की गुणवत्ता को परखने का एक साक्षात आईना है। पिछले कुछ दिनों से दैनिक समाचार पत्र हिन्दुस्तान में दिल्ली के पब्लिक स्कूलों पर एक एक पेज के फीचर छप रहे हैं जिनमें स्कूलों की गुणवत्ता और उसकी उपलब्धियों का बखान बड़े जोर शोर से किया जा रहा है। सम्भव है कि इसके पीछे के कारण आर्थिक हों लेकिन जो भी हो पब्लिक स्कूल अपनी सफलता के झंडे गाड़ रहे हैं। और अपना बखान भी कर रहे हैं। लेकिन क्या दिल्ली के सरकारी स्कूल इतनी योग्यता रखते हैं कि वो अपनी उपलब्धियों को पैसे देकर ही सही छपवा सके। उनका प्रचार कर सकें। आप पब्लिक स्कूल के किसी बच्चे से मिलिये और दूसरी ओर उसके सामने सरकारी स्कूल के बच्चे को खड़ा करके देखिये। आपको जमीन और आसमान का अन्तर नजर आयेगा। यह अन्तर केवल क्लास पर आधारित नहीं होगा। आप एक पल को उनकी आर्थिक पृश्ठभूमि को अलग करके देखें। केवल ये आधार लें कि वो स्कूल में क्या सीख रहे हैं। स्कूल के घंटों में उनपर किस तरह की निगरानी रखी जा रही है। उनको किस तरह की शिक्षा दी जा रही है। स्कूल के अध्यापकों से उनका सम्बन्ध कैसा है। वो अपने छात्रों पर कितना ध्यान दे रहे हैं। आपको एक गजब का अन्तर नजर आयेगा। ये अन्तर स्कूल द्वारा उपलब्ध कराई जा रही देखरेख का अन्तर है। षिक्षा के नाम पर दिल्ली सरकार ने अपने कुल बजट का दस प्रतिशत से ज्यादा खर्च करने की बात कही। स्कूलों के इन्फ्रास्टक्चर के लिये ढ़ाई सौ करोड़ रुपये और शिक्षा के लिये कुल मिलाकर 1050 करोड़ रुपये बजट के रुप में देने की घोषणा सरकार ने की। लेकिन वो बजट आंखिर जाता कहां है। उसका असर इन बच्चों पर क्यों दिखाई नहीं देता। ये बात सही है कि ये बच्चे अक्सर ऐसी पृश्ठभ्ूामि के होते हैं जहां इनके अभिभावक इनपर ज्यादा खर्च कर पाने कि क्षमता नहीं रखते या फिर इन्हें पढ़ाई के अतिरिक्त अन्य संास्कृतिक गतिविधियों से नहीं जोड़ पाते। लेकिन स्कूल क्यों अपने जरुरी उत्तरदायित्वों को पूरा नहीं करते। उनके पास तो बजट के रुप में एक मजबूत आर्थिक आधार है। या फिर सरकार क्यों इन स्कूलों पर इतना डंडा नहीं करती कि ये बच्चों पर आवश्यक निगरानी रख सके। उन्हें आचार व्यवहार के सामान्य तौर तरीके सिखा सकें।


छोटे शहरों से तुलना करेंगे तो पायेंगे कि दिल्ली के सरकारी स्कूलों के हाल बेहद शर्मनाक हैं। इससे कई बेहतर पणिाम छोटे कस्बों के सरकारी स्कूल दे रहे हैं। जबकि उनके पास दिल्ली के स्कूलों से बहुत कम संसाधन हैं। फर्क महज ध्यान देने ना देने का है। सरकारी स्कूलों के लिये सरकार की उपेक्षा को दूसरे चश्मे से देखें तो ऐसा होने की वजह साफ दिखाई देती है। पब्लिक स्कूल। यानी मोटा पैसा। और कई षिक्षा माफियाओं के कमिशन सरकारी अफसरों की झोली में। खुद सरकार में बैठे नेताओं के कितने पब्लिक स्कूल दिल्ली में चल रहे हैं ये बात किसी से नहीं छुपी है। ऐसे में ऐसे हालात पैदा करना जरुरी है जिससे सरकारी स्कूल लोगों के लिऐ अपने बच्चों को पढ़ाने के अन्तिम विकल्प भी न बने रहें। ऐसे में होगा यही कि वही लोग अपने बच्चों को इन स्कूलों में भेजेंगे जो कुछ भी करेके उन्हें किसी निजी स्कूल में भेजने की हैसियत नहीं रख सकते। और निजी स्कूलों में बच्चेां की तादात बढ़ती चली जायेगी। सरकार और शिक्षा माफिया दोनो को इससे लाभ मिलेगा। मौजूदा हालात देखकर सरकार की ये मंशा साफ हो भी रही है।

कम से कम जामिया की छात्रा के साथ हुई मौजूदा घटना से तो यही जाहिर होता है। स्कूल प्रागण में उस स्कूल के बच्चे इतने अराजक तभी हो सकते हैं जब स्कूल को इस बात से कोई मतलब न हो कि उसकी लोगों में किस तरह की छवि बन रही है और वहां पढ़ रहे बच्चे किस दिशा में जा रहे हैं। अगर ऐसा नही है तो सरकार को इन स्कूलों की असलियत की तरफ साफ निगाहों से देखना होगा। इनके स्थिति में सुधार के लिये कुछ करना होगा। ताकि कल के दिन सरकारी और निजी स्कूलों के बीच अन्तर की ये खाई दिल्ली की योग्य और अयोग्य जनसंख्या में न बदल जाये। ताकि गरीबों के बच्चे भी दिल्ली में पढ़कर तरक्की करने के सपने देख पांयें।

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1 Comment on "बदतर होते ये सरकारी स्कूल"

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अविनाश वाचस्पति
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एक वीभत्‍स होती समस्‍या की ओर जागरूकता लाने का प्रयास सराहनीय है।

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