ताज़ा रेजगारी

फिर वही किंतु-परंतु

बहुत सारा किंतु-परंतु है जीवन में
किंतु जब तुम पास होती हो
तो सब ग़ायब हो जाता है
 
मैं बहुत पास से देखता हूँ तुम्हारी मुस्कान
इतने पास से कि वो मुझे अपनी लगने लगती है
मैं अपनी घबराहटों को महसूस करने लगता हूँ तुम्हारे भीतर
और तुम्हारे भीतर का डर कभी-कभी कर देता है मेरे रोंगटे खड़े
 
किसी रात हम बहुत देर तक एक दूसरे में खोजते रहते हैं एक दूसरे को
हमारे स्पर्श लाँघ जाते हैं निजता की दहलीज़
हम एक दूसरे को बहता हुआ महसूस करने लगते हैं एक दूसरे के रक्त में
जीवन की तमाम छटपटाहटें जैसे धीरे-धीरे शांत होती नदी में विलीन हो जाती हैं
 
परंतु हमारे न चाहने के बावजूद
हमें लौट आना होता है अपनी-अपनी निजताओं के खोल में
हम छोड़ आते हैं एक दूसरे के शरीरों के मरुस्थल में
अपने-अपने स्पर्श के चिह्न
फिर-फिर लौट आने के लिए
 
तुमसे विमुख होते ही
जीवन में किंतु परंतु वापस लौट आता है
ग़ायब हो गया सब कुछ
एक शोर की शक्ल में आस-पास मडराने लगता है
मशीनों की लड़खड़ाती आवाज़ें, रोशनियों का आतंक, भविष्य के भुलावे ,सम्भावनाओं के भ्रम
सबकुछ एक डराती दुनिया के लिबास में
एक कठिन पहाड़ बनकर आखों के सामने खड़ा हो जाता है
टीवी पर एक बेशर्म एंकर हादसों की तस्वीर बुनने लगता है
मैं अपने फ़ोन में चेक करने लगता हूँ कि सेलरी आई कि नहीं
 
जीवन उसी ढर्रे पर चलने लगता है
जिस पर हम दोनों ही नहीं चलना चाहते,
और फिर वही किंतु-परंतु हमारे आस पास मडराने लगता है
हम चाहकर भी कुछ नहीं कर पाते, कुछ भी तो नहीं

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