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पढ़ने की संस्कृति विकसित करती हैं बाल पत्रिकाएं

हमारे समय के बच्चे तकनीकों के इर्द गिर्द जी रहे हैं। मोबाईल, टीवी और इन्टरनेट उनकी दुनिया में बहुत गहरे समाये हुए हैं। उन्हें हाई डेफिनिशन वीडियो गेम्स की दुनिया के सुपरहीरोज के साथ कम्पीटिशन करने में मजा आता है। हांलाकि ये बातें शहरी और कस्बाई बच्चों के पर ही ज्यादा लागू होती है। ऐसे में बच्चों के किताबों के जरिये मनोरंजन की सम्भावना कमती जा रही है। उन्हें कहानी, कविताएं पढ़ने से बेहतर कहांनियों में जीने में ज्यादा मजा आने लगा है। वर्जुअल दुनिया की इलैक्टोनिक कहानियों में बेशुमार हिंसा, थ्रिल, सस्पेंस और वो सारे तत्व मौजूद हैं जो बच्चों में एक अजीब से हिंसक व्यवहार को पैदा करने में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। टीवी के कार्टून उन्हे सिखाते हैं कि माता-पिता का कहना न मानना, होमवर्क न करना, सुपरहीरो की तरह के स्टंट करना यह सब अपनी तरह का एक टशन है। और इस सब से बड़ी बात यह कि यह सब उन्हें बैठै बैठे बिना अपना दिमाग लगाये करना है। ऐसे में तकनीकी दुनिया से अलग कागज के पन्नों पर अपना भेजा सरकाना उन्हें बड़ा अजीब और आउट डेटेड लगने लगा है। माने यह कि पढने की संस्कृति कहीं खत्म सी होती जा रही है। इसी वजह से बच्चों की पत्रिकाओं के लिए भी एक तरह की विलुप्ति का संकट गहरा रहा है।
आज के दौर में बाल पत्रिकाओं की आंखिर जरुरत क्या है। और ऐसी कौन सी बाल पत्रिकाएं हैं जो मौजूदा समय में बालोपयोगी साहित्य उपलब्ध करा रही हैं। ये सवाल अक्सर इस दौर के अभिभावकों के मन में उठते होंगे। जो जानकारी और समय के अभाव में बच्चों तक यह साहित्य नही पहुचा पाते। पेशे से शिक्षक महेश पुनेठा जी का यह लेख ऐसे अभिभावकों की समस्या का समाधान कर सकता है। समकालीन बालपत्रिकाओं की पड़ताल करता यह लेख उन्होंने इस ब्लाग के लिए भेजा है।


साहित्यिक अभिरुचि और पढ़ने की संस्कृति की दृष्टि से देखें तो हिंदी समाज का परिदृश्य काफी निराशाजनक है।हमारे समाज में स्कूली पाठ्यक्रम से बाहर पढ़ने की संस्कृति का लगभग अभाव सा है।अपने आस-पास ऐसे लोगों को अंगुलियों में गिना जा सकता है जिन्हें पढ़ने-लिखने का शौक हो तथा जो अपनी आय का एकांश भी पुस्तकों को खरीदने में खर्च करते हों ।लिखने का शौक रखने वाले लोग थोड़ा बहुत पढ़ लेते हैं अन्यथा उनमें भी ऐसे ’सुधीजन‘ हैं जो यह मानते हैं कि अन्य का लिखा हुआ पढ़ने से उनके लेखन की मौलिकता समाप्त हो जाती है। आज साहित्य के विशुद्ध पाठक तो किसी दुर्लभ प्रजाति से हो गए हैं। अन्य को तो छोड़िए अध्यापन से जुड़े लोगों का भी अध्ययन से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं रह गया।पढ़ना उन्हें सबसे बोरियत भरा काम लगता है। ऐसे में भला क्या आशा की जा सकती है कि बच्चों में साहित्य पढ़ने-लिखने की संस्कृति विकसित हो पाएग।
ऐसा नहीं कि बच्चे स्कूली पाठ्यपुस्तकों से इतर अन्य पुस्तकें पढ़ना नहीं चाहते हों ,बल्कि माता-पिता ही इसे समय एवं साधनों की बरबादी समझते हुए उन्हें पाठ्यपुस्तकों से इतर पत्र-पत्रिकाओं या पुस्तकों के अध्यययन से रोकते हैं।यहाॅ तक की अनेक अध्यापक भी इस मान्यता के होते हैं। इसीलिए देखने को मिलता है कि अधिकांश विद्यालयेंा में या तो पुस्तकालय होते ही नहीं अगर कहीं अपने चेहतों को लाभ पहॅुचाने की दृष्टि से एकमुश्त सरकारी खरीद के तहत शासन द्वारा विद्यालयों में पुस्तकालय स्थापित कर भी दिये जाते हैं तो पुस्तकें आलमारियों में धूल खा रही होती हैं। या उन्हें दीमक या चूहे पढ़ रहे होते हैं।किताबें बच्चों के हाथों तक नहीं जाती । इस बात में किसी की कोई रुचि नहीं रहती । हमारे विद्यालयों में दैनिक समाचार पत्रों के अलावा अन्य पत्र-पत्रिकाओं के लिए कोई स्थान नहीं रहता, दैनिक अखबार भी बच्चों को देखने तक को नहीं मिलता ।
इन अध्यापक -अभिभावक को कौन समझाए कि साहित्यिक पुस्तकों या पत्र-पत्रिकाओं को पढ़ना फालतू का कार्य नहीं बल्कि इससे बच्चे को अपने आस-पास को देखने एवं समझने की दृष्टि मिलती है ।उसकी उत्सुकता में वृद्धि होती है।बच्चे की कल्पनात्मक एवं विश्लेषणात्मक क्षमताओं का विकास होता है जो अंततः ज्ञान निर्माण में सहायक सिद्ध होती है।उसे अपने आप को व्यक्त एवं भाषा को सम्द्ध करने का अवसर मिलता है ।साहित्य बच्चे के लिए स्वयं को और दुनिया को जानने का माध्यम भी होता है। उससे वह आनंद भी प्राप्त करता है जो संतुलित विकास के नजरिए से जरूरी है। सबसे बड़ी बात एक अच्छे मनुष्य के रूप में उसकी संवेदनाओं का विस्तार होता है।वह प्रजातांत्रिक मूल्यों को आत्मसात करता है। उसमें वैज्ञानिक दृष्टि एवं विवकेशीलता का विकास होता है।
बच्चों में साहित्यिक अभिरूचि एवं पढ़ने की संस्कृति विकसित करने की दृष्टि से बाल पत्र-पत्रिकाओं की महत्वपूर्ण भूमिका है। पत्र-पत्रिकाओं में सामग्री की विविधता बच्चों को आकर्षित करती है।विविध रूचि के बच्चों को इनमें अपनी -अपनी रूचि व पसंद की सामग्री मिल जाती है। बच्चे कविता ,कहानी ,पहेलियों व चुटकलों का ही रसास्वादन नहीं करते बल्कि उन्हें देश -दुनिया की जानकारी के साथ-साथ बहुत कुछ जोड़न-तोड़ने ,बनाने ,ढूॅढने एवं करने को मिलता है जो बाल मनोविज्ञान के अनुकूल होता है।ये सामग्री बच्चों की कल्पनाशीलता और रचनात्मकता को बढ़ाने में सहायक होती हैं। आज देशभर में बच्चों के लिए हिंदी की लगभग चार दर्जन से अधिक पत्रिकाएं प्रकाशित हो रही हैंै।इसके अलावा दैनिक समाचार पत्रों में साप्ताहिक परिशिष्ट के रूप में बाल साहित्य पढ़ने को मिल जाता है।यह अलग बहस का विषय है कि इनमें से कितनी पत्र-पत्रिकाओं में वैज्ञानिक द्ृष्टि एवं विवकेशीलता पैदा करने वाला साहित्य प्रकाशित हो रहा है।यहाॅ हम केवल उपलब्धता के आधार पर कुछ प्रमुख बाल पत्रिकाओं का उल्लेख कर रहे हैं-
1-चकमक -सं0-सुशील शुक्ल एकलव्य ई-10शंकर नगर बी.डी.ए.काॅलोनी ,शिवाजी नगर भोपाल म.प्र.462016 मू0-15/रु0एक प्रति । यह महत्वपूर्ण बाल विज्ञान पत्रिका है जिसकी आवृत्ति मासिक है। नवंबर07 से यह पत्रिका एक नये रूप-रंग में अधिक आकर्षक बन कर आयी है। इसमें कहानी ,कविता,चित्रकथा के साथ-साथ विज्ञान ,इतिहास,भूगोल आदि विषयों से संबंधित रोचक एवं स्तरीय आलेख रहते हैं। इनकी विशेषता है कि ये आम बोल-चाल की भाषा में होते हैं,जिससे बच्चेां को आसानी से समझ में आ जाते हैं।पत्रिका बच्चों को सोचने -समझने एवं कुछ नया करने के पर्याप्त अवसर प्रदान करती है।इसमें बच्चों की सृजनात्मकता को पूरा-पूरा सम्मान दिया जाता है।बच्चों के हाथेां बने चित्र व उनकी लिखी छोटी -छोटी कहानियों ,कविताओं और घटनाओं को सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया जाता है। सबसे महत्वपूर्ण बात पत्रिका बच्चों मेें वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने में बल देती है। पत्रिका न केवल बच्चों के लिए बल्कि नवाचारी अध्यापकों के लिए भी उपयोगी है।
2-अनुराग-सं0-कमला पाण्डेय डी-68 निराला नगर लखनऊ226020 मू010/रु0एक प्रति । यह पत्रिका त्रैमासिक है पर बच्चों को अक्सर ही उससे अधिक प्रतीक्षा करनी पड़ती है। पत्रिका का संपादकीय गरीब एवं उपेक्षित वर्ग के बच्चों की समस्याओं पर कंेद्रित रहता है जो अन्य बच्चों को अपने समाज के इन उपेक्षितों के बारे में सोचने एवं उनके दुख-दर्द के कारणों को जानने के लिए प्रेरित करता है।इसमें प्रकाशित कहानी-कविताओं में भी इन प्रश्नों को उठाया जाता है।इनमें बच्चे अपने आस-पास के हर अच्छे- बुरे अनुभव से रूबरू होते हैं। बच्चे बचपन से ही अपने परिवेश की सच्चाइयों को समझने लगंे ताकि भविष्य में उनके प्रति एक सही दृष्टिकोण अपना सकें,पत्रिका का इस मान्यता पर विश्वास दिखाई देता है।बच्चों की रचनाओं को भी पत्रिका में उचित स्थान दिया जाता है।पत्रिका में प्रकाशित बच्चों द्वारा संचालित साहित्सिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों की खबरें अन्य बच्चों को कुछ करने की प्रेरणा देती हैं।’बाल कम्यून ‘ स्थापित करने का अभियान बच्चों को बेहतर समाज निर्माण की दिशा मेें प्रशिक्षित करने का अच्छा प्रयास है।कुल मिलाकर पत्रिका की विषय सामग्री बच्चों में विवकेशीलता पैदा करने वाली रहती है जो आज की बहुत बड़ी आवश्यकता है।
3-बच्चों का इंद्रधनुष – सं0- अंशुमाला गुप्ता ,हिमाचल ज्ञाान विज्ञान समिति ,तीर्थनिवास ,इंजनघर, संजौली ,शिमला -6 मू0- 10/रु0एक प्रति । यह हिमाचल ज्ञान विज्ञान समिति द्वारा तैयार मासिक पत्रिका है। विषय सामग्री एवं रूप-रंग की दृष्टि से ’अनुराग‘ से काफी मिलती -जुलती है। कहानी ,कविता व पहेलियों के साथ-साथ पत्रिका में सम्मलित महत्वपूर्ण जानकारियाॅ और खेल गतिविधियाॅ बच्चों को बाॅधती हैं। ’विज्ञान के प्रयोग ‘ स्तम्भ पत्रिका की एक विशिष्टता प्रदान करता है।वैज्ञानिक चेतना के विकास की दृष्टि से पत्रिका महत्वपूर्ण कार्य कर रही है। पर आश्चर्य है बच्चों की रचनात्मकता के लिए कोई स्थान इस पत्रिका में नहीं दिखाई देता है।
4-बाल प्रहरी -सं0- उदय किरौला ताकुला ,अल्मोड़ा 263628 मू0-10/रु0एक प्रति।इस त्रैमासिक में बच्चों की रचनाशीलता को भरपूर स्थान दिया जाता है। बच्चों की रचनाओं को इतना प्रतिनिधित्व शायद ही किसी अन्य पत्रिका में दिया जाता हो। यदि बच्चों के लिए स्वयं करने की खेल-गतिविधियाॅ बढ़ा दी जाय तो पत्रिका की उपयोगिता और अधिक बढ़ जाएगी । कुमाऊॅनी-गढ़वाली रचनाओं की भी पत्रिका में उपस्थिति रहती है।पत्रिका में निरंतर निखार आ रहा है। बाल साहित्य के नये पुराने सभी रचनाकारों की रचनाएं इस पत्रिका में पढ़ने को मिल जाती है। उदीयमान बाल साहित्यकारों के लिए यह एक मंच का काम भी कर रही है जो पत्रिका की उपलब्धि मानी जाएगी । ’बाल प्रहरी‘ बाल साहित्य की एक पत्रिका मात्र नहीं बल्कि एक अभियान है। पत्रिका की ओर से बच्चों के बीच समय-समय पर कहानी- कविता-नाटक लेखन , काव्य गोष्ठी ,रंग कार्यशाला जैसी विभिन्न गतिविधियाॅ आयोजित कराई जाती रहती हैं। साथ ही हर साल राष्ट्रीय स्तर का बाल साहित्यकार सम्मेलन भी ।
5-बाल भारती– सं0-विभा जोशी कमरा नं0 120 ,प्रथम तल सूचना भवन ,सी 0जी0 ओ0 कांपलेक्स ,लोदी रोड ,नई दिल्ली -110003 मू0 8/रु0 एक प्रति ।पिछले साठ सालों से यह मासिक पत्रिका सूचना प्रसारण विभाग की ओर से निकाली जा रही है। इसमें बच्चों के लिए कहानियाॅ ,कविताएं ,लेख आदि सभी कुछ प्रकाशित होता है। नियमित रूप से प्रकाशित होने वाली ’शीर्षक बताओ‘ तथा ’चित्र बनाओ‘ प्रतियोगिताएं बच्चों को खूब भाती हैं।इसके अलावा खेल क्विज , विज्ञान मंच , मुझे भी जानो , दुनिया रंग-रंगीली ,के.बी.सी. क्विज ,चिंटू खरगोश आदि स्तम्भ बच्चों के लिए उपयोगी और रोचक हैं। बच्चों की रचनाओं के लिए कम ही स्थान रहता जिसको बढ़ाए जाने की आवश्यकता है। कभी -कभी बाल साहित्य से संबंधित पुस्तकों की चर्चा ,बाल साहित्य के क्षेत्र में नया क्या प्रकाशित हो रहा यह जानने की दृष्टि से उपयोगी है, इसको नियमित किए जाने की आवश्यकता है।

6-नंदन– सं0- मृणाल पाण्डे एच0टी0 मीडिया लिमिटेड हिंदुस्तान टाइम्स हाउस 18-20 कस्तूरबा गाॅधी मार्ग , नई दिल्ली -110001मू0-15/रु0एक प्रति। खिचड़ी भाषा में लिखी रचनाओं वाली यह मासिक पत्रिका पहली नजर में ही मध्यवर्ग के बच्.चों के लिए प्रकाशित लगती है।जानकारी एवं मनोरंजन की दृष्टि से ठीक-ठाक पत्रिका है। बच्चों को सीखाने पर इसका अधिक जोर दिखाई देता है।इसमें वह सब कुछ मिल जाएगा जो सामान्यतः बाल पत्रिकाओं में छपता रहता है पर दृष्टिसंपन्नता का अभाव झलकता है ।हाॅ ,रंग-विरंगे चित्र बच्चों को देर तक बाॅधने में सफल रहते हैं।पत्रिका में प्रकाशित विदेशी और जासूसी कहानियाॅ बच्चों को काफी पसंद आती हैं।
7-बालहंस -सं0-गुलाब कोठारी राजस्थान पत्रिका प्रकाशन ई-5झालाना संस्थानिक क्षेत्र जयपुर ,राज0 मू0-6/रु0एक प्रति । शिक्षाविदों का मानना है कि बच्चे उपदेश पसंद नहीं करते ,उन पर उपदेशों का नहीं व्यवहार का प्रभाव पड़ता है।पर लगता है इस पाक्षिक पत्रिका का इस मान्यता में विश्वास कम ही है।पत्रिका में प्रकाशित कविता-,कहानियों का सीख देने में ही अधिक बल रहता है।पत्रिका मेें बच्चों के लिए ढेर सारी जानकारियाॅ रहती हैंै।बच्चों की अंग्रेजी दुरस्त करने के उद्देश्य से अंग्रेजी के नियमित रूप से दो पृष्ठ रहते हैं।प्रतियोगिताएं भी खूब रहती हैं।भाषा के प्रति यहाॅ भी लापरवाही ही दिखाई देती है,’हिंग्लिश‘ का बोलबाला है।
8-नन्हे सम्राट-सं0- आनंद दीवान दीवान पब्लिकेशंज प्रा0 लि0 ए-6/1मायापुरी फेज नई दिल्ली 110064 मू015/रु0एक प्रति । यह कहानी प्रधान मासिक पत्रिका है। कहानी के अलावा कभी-कभार ,भूले-भटके लेख भी पढ़ने को मिल जाते हैं।बच्चों की रचनाओं के लिए कोई स्थान नहीं है , लगता है संपादक को बच्चों की रचनात्मकता पर विश्वास ही नहीं है और न ही उनको अवसर प्रदान करने में। हाॅ, बच्चों के करने के लिए कुछ नई मानसिक खेल गतिविधियाॅ हैं जो निःसंदेह बच्चों के समक्ष चुनौती प्रस्तुत करती हैं।अजब-गजब रोचक समाचार भी बच्चों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं।
9-बाल भाष्कर– सं0- रचना सक्सेना -समंदर दैनिक भाष्कर 6द्वारका सदन , एम0पी0 नगर भोपाल -11,मू0-5/रु0एक प्रति। यह दैनिक भाष्कर की पाक्षिक बाल प्रस्तुति है। हिंदी-अंगे्रजी की संयुक्त पत्रिका सी प्रतीत होती इस पत्रिका में कहानी ,लेख , सामान्य जानकारियाॅ के साथ-साथ बच्चों के मतलब के बहुत से खेल भी हैं।सारे स्तम्भों के नाम अंग्रेजी में ही दिए गए हैं शायद इसका उद्देश्य अंग्रेेजी का शब्दकोश बढ़ाना हो। खेल गतिविधियाॅ वही सब कुछ हैं जो अधिकांश बाल पत्रिकाओं में दिखाई देती हैं।

10-चंपक -सं0-परेशनाथ दिल्ली प्रेस भवन ,ई -3 झंडेवाल एस्टेट , रानी झाॅसी मार्ग नई दिल्ली 110055 मू0-12/रु0एक प्रति। यदि सामान्यतः किसी से बाल पत्रिका का जिक्र किया जाए तो जो नाम तुरंत जुंबा पर आता है वह है चंपक । इसका कारण इसकी सहज उपलब्धता । हर छोटे-बड़े कस्बे या शहर में यह पत्रिका आसानी से उपलब्ध हो जाती है । इसमें प्रकाशित कहानियों में मनुष्यों की अपेक्षा पशु -पक्षी पात्र के रूप में अधिक दिखाई देते हैं।तीन-चार चित्र कथाएं हर अंक में रहती हैं।कविता के लिए इसमें स्थान कम ही रहता है ।प्रत्येक अंक में एक ’चंपक चेकर्स ‘ रहता है जिसे डायस की मदद से लूडो की तरह खेलते हैं।बच्चों की कलम के लिए दो पृष्ठ दिए गए हंै,जो पर्याप्त नहीं कहे जा सकते ।

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4 Comments on "पढ़ने की संस्कृति विकसित करती हैं बाल पत्रिकाएं"

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संगीता पुरी
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बहुत अच्‍छी जानकारी दी है आपने इस आलेख में….हमें बच्‍चों को ये पत्रिकाएं देनी चाहिए….उन्‍हें पढने के लिए प्रेरित करना चाहिए।

Udan Tashtari
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रोचक और दिलचस्प आलेख.

vijay gaur/विजय गौड़
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महेश पुनेठा जी ने यह अच्छा आलेख तैयार किया है, उन्हें भी और प्रस्तुत करने के लिए आपको भी बहुत बहुत आभार।

jayram
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kagaj ki dunia wakai lajabab hai. …………………….bal- patrikao ki jagah koi bhi nahi le sakta . nani-dadi ki kahaniya wilupt hoti ja rahi hain .ya yun kahen ki ekal pariwar ke western concept ne nani -dadi ko hi khatm kar diya aur ab bal patrikao ko bhi vidio games aur e- comics ke jariye hamse chhinne ki koshish jari hai.