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पाबंदी

थोड़ी थोड़ी धूप संभाले रिमझिम सी बरसात भी हो
चुप्पी भी हो खामोशी भी थोड़ी थोड़ी बात भी हो

टप टप की शहनाई गूंजे इन्द्रधनुश के रंगों में
धूप की गलबहियां भी हों और ठिठुरन की सौगात भी हो

कुछ ना हो और कुछ ना होना कुछ होने सा लगने लगे
फुरसत वाली सुबह साथ हो खाली खाली रात भी हो।

बाजारों का शोर शराबा लहरों में खो जाये कहीं
पैसे धूं धूं जलने लगें फिर कोई झंझावात न हो।

वो शैतान सी जल्दीबाजी खाले कोई जहर कहीं
फुरसत पर जल्दीबाजी का फिर कोई आघात न हो।

समय की पाबंदी के चलते मिलना जुलना बंद हो
मिलने की मंशा भी रहे और प्यार भरे जजबात भी हों।

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1 Comment on "पाबंदी"

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पंख
Guest

धूप की गलबहियां भी हों और ठिठुरन की सौगात भी हो
wah kya likha hai 🙂