ताज़ा रेजगारी

पागलों की तरह

खिड़कियों से बंद हैं
जो ये दरवाजे
मुझे शक है
कि इस मकान में कोई रहता है।

कोई आवाज कसमाती नहीं
हवा चलती नहीं
एक धूप है
जो जलाती जाती है
न जाने किन सीखचों के रास्ते
वो पा लेती है जगह
भीतर घुस आने की।

मेरे सवाल
किसी लू में जल रहे हैं
जवाबों की राख
किसी जर्द सी
चिपकी पड़ी है
अलमारियों में।

जाने वो कौन सी दरारें हैं
जो अहसासों के इर्द गिर्द
औंधी लेटी हुई हैं
जिनसे कुछ छनता हुआ सा
नसों में भर रहा है
कुछ जिसे लोग दर्द कहते हैं।

झांकना चाहता है
इन खिड़कियों से वो पत्ता
जिसे तितलियां कहती हैं
अनपा घर।

और मैं कर रहा हूं इन्तजार
ऐसी हवा का
जो लू को धकेलती
आएगी एक दिन मेरे घर में
और कोई सिरफिरा पत्ता
आकर गुनगुनाएगा एक ऐसा गीत
जो मलहम की तरह
पसर जायेगा रगों में।
मैं छटपटा रहा हूं मिलने को
ऐसी हवा से
पागलों की तरह।

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