ताज़ा रेजगारी

पहाड़

महेश चंद्र पुनेठा जी ने इस ब्लौग के लिए कई सारी कविताएं उपलब्ध कराई हैं। समय समय पर उनकी कविताओं के जरिये इस ब्लाग के पाठकों को पहाड़ की खुशबू और जायके का अहसास होता रहेगा। फिलहाल पेश है उनकी ये कविता।

पहाड़ !
कितने प्यारे लगते हो
जब रोज सुबह-सवेरे
धर लाते हो सूरज को
अपने भारी-भरकम कंधों पर
तुम्हारे इस करतब पर
खिलखिला उठती हैं दिशाएं भी
हिमाच्छादित शिखर
रंग जाते हैं भट्टी में गर्म हो रहे
लोहे के रंग में ।
पहाड़!
कितने प्यारे लगते हो
जब जाड़ों में
ओढ़ लेते हेा बर्फ की रजाई
सो जाते हो चुपचाप
कुछ दिनों मे
निकलते हो उससे बाहर
लगते हो नहाए -धोए से
किसी मजदूर की तरह ।
पहाड़!
तब क्या कहने तुम्हारे सौंदर्य के
जब बाॅज -बुरूॅश के
हरे -भरे और घने जंगल से ढके
दिखाई देते हो तुम
और उस पर
बिखरा होता है लाल रंग ।

दिख जाओ कहीं अगर
देवदार के वृक्षों से
आकाश को
छूने का प्रयास करते हुए
और आशीर्वाद देते हुए ऋषियों
की मुद्रा में खड़े
मन करता है
घंटों निर्निमेष निहारते रहॅू तुम्हें।

पर पहाड़!
सबसे प्यारे लगते हो
बताऊॅ कब
जब तुम्हारी खुरदुरी पीठ पर
चढ़ रही होती है कोई पहाड़ी स्त्री
और तुम थोड़ा सा झुक जाते हो
नीचे घाटी में
कोई घसियारिन
गा रही होती है न्यौली
साथ उसके
तुम भी भाग लगाने लगते हो
चली जाती है आवाज दूर-दूर तक।
सचमुच तब तुम
बहुत प्यारे लगते हो मुझे
किसी डाकिए की तरह ।

Comments

comments

Leave a Reply

1 Comment on "पहाड़"

Notify of
avatar
Sort by:   newest | oldest | most voted
Mired Mirage
Guest

बहुत सुन्दर !घुघूती बासूती

wpDiscuz