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पहाड़ का जीवन

आप कभी पहाड़ी इलाकों में जरुर गये होंगे। क्या महसूस किया आपने…….?यही ना कि इससे खूबसूरत कोई चीज दुनिया में शायद बनी ही ना हो। कितना खुशनुमा है यहां का जीवन। कितना साफ सुथरा, ताजगी भरा बेहद सहज और सरल। आपाधापा से दूर। मन किया होगा कि बस यहीं जीवन बिताने को मिल जाये तो जन्नत और क्या होगी। आपकी एक सैलानी की नजर जो नहीं देख पाई आइये आपको दिखाते हैं पहाड़ों के भीतर की दूसरी दुनिया का सच। महेश चंद्र पुनेठा जी की ये कविता आपको उस सच से रुबरु कराएगी। गहरे तक पहाड़ के भीतर के हाड़ का एक नजारा देखना नहीं चाहेंगे आप………..?

ऊॅचे-ऊॅचे पहाड़
कुछ भूरे
कुछ हरे
कुछ सफेद
गहरी घाटियाॅ
कुछ सिमटी
कुछ फैली
उन पर तिरते बादल
आॅचल -सा उड़ता कुहरा
कल-कल /छल-छल
करती नदी
झर-झर झरते झरने
डब-डबाये ताल
मखमली घास और
रंग-बिरंगे फूलों से भरे
बुग्याल
बाॅज/बुरूॅश /चीड़ /देवदार आदि के

मनमोहक सूर्योदय -सूर्यास्त
सघन जंगल
जंगल में
नाना प्रकार से पशु-पक्षी
ठंडी हवा
सैलानी !
इतना ही सुंदर नहीं है
सब कुछ
पहाड़ में ।
आओ ,सैलानी आओ!
हिल स्टेशनों से इधर-उधर आओ
वो सामने
गाॅव देख रहे हो ना!
वहाॅ से आने में
मुख्य सड़क तक
चढ़ाई चढ़ते हुए
सूख जाता है गला
अगर पड़ जाए कभी
कोई बीमार
डोली के सिवाय
साधन नहीं दूसरा
अस्पताल तक लाने का
कई -कई बार होता है ऐसा
रोगी की
अधबिच रास्ते में ही
समाप्त हो जाती है जीवन लीला

ये जो
एकदम सीधे खड़े पहाड़
देख रहे हो ना !
इसमें चढ़
घास काटती हैं औरतें
तनिक असंतुलन बिगड़ने का मतलब
नीचे गधेरा या उफनती नदी
ऐसी घटनाएॅ
आम होती है यहाॅ
जैसे
बाघ द्वारा बच्चों को
उठा ले जाने की
वारदात के दिनों
कफ्र्यू की सी स्थिति हो जाती है
दिन ढले
बंद हो जाते हैं
घरों के दरवाजे
देर हो जाय थोड़ी अगर
किसी परिजन के
इधर-उधर से लौटने में
साॅसें अटक जाती है परिवार भर की

जिस पगडंडी से
अभी गुजर रहे हो तुम
बारिश के दिनों
ऊपर चट्टान से गिरते पत्थर
राही को
कब अपने साथ ले जायें
कभी तो
लाश मिलनी कठिन

ये सीढ़ीदार खेत
हाड़तोड़ मेहनत के बाद भी
नहीं होता है इनमें
सालभर का अनाज
कभी अतिवृष्टि
कभी अनावृष्टि
बच गयी अगर
प्रकृति की मार से
जंगली जानवरों से बचना
एक संघर्ष है मुश्किल भरा ।

ये चाय के खुमचे के बाहर
झुंड में बैठे लोग
फेंट रहे हैं तास के पत्ते
खींच रहे हैं दमभरी चिलम
रोजगार के अभाव में
नैराश्य में डूबे
काट रहे हैं समय
इनके कुछ भाई -भतीजे
महानगरों में हैं जो
होटलों में माॅज रहे होंगे भाने बर्तन
या कर रहे होंगे चैकीदारी
रात-रात जागकर कुछ फैक्ट्रियों में
दो-चार जो पा गए
ठीक-ठाक सरकारी नौकरी
चले गये हैं गाॅव छोड़कर
ये अधेड़ औरत
पथरा गई है जिसकी आूॅखें
उभर आई है
समय से पहले झुर्रियाॅ
दबाये हैं सीने में जख्म
पहले मॅाग सूनी हुई
अबके गोद सूनी
शहीद की माॅ हाने का झूठा गौरव
रोने भी नहीं देता खुलकर
लड़के के शहीद होने पर
मिला जो कुछ भी
शहीद की विधवा
लेकर उसे
जा चुकी है शहर
बच्चों को पढ़ाने -लिखाने
किसके सहारे काटे
माॅ पहाड़-सा जीवन
और भी हैं-
दुख
अभाव
संघर्ष
क्या-क्या बताऊॅ
सैलानी!
समय हो अगर
तुम्हारे पास
तो ठहरो कुछ दिन
देखो
पहाड़ को
जीकर ।

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5 Comments on "पहाड़ का जीवन"

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PC Godiyal
Guest

इसीलिये तो,
यह सब देखकर
कुछ मजबूरियों के चलते,
और कुछ परिस्थितियों
का सामना न कर पाने की
हिम्मत के चलते,
अपने बहुत से
मुल्की बन्धुवों की तरह
मैंने भी एक कायर भांति
पहाड़ छोड़ दिया,
हमेशा के लिए !!

मुनीश ( munish )
Guest

Believe me condition in Himachal is not as bad as described in this poem.Blame it on U. P. which alvez exploited Uttarakhand,blame it on people who changed an honest man like Khanduri.
Tourist is already troubled and thats why he came seeking refuge in hills.If u c him dropping polythene just push in the khadd below.

PC Godiyal
Guest

पंतजी, बहुत अच्छे ढंग से व्यक्त किया है आपने पर्वतीय सच्चाई को !

उमेश पंत
Guest
pushing someone in khadda is not in our culture munish ji and i think its nor our right too. pahaad is really very loyal to his visitors..it has a soft sens of respect in its soil which cant take such step but we really need to sensitize people not to pollute its beautifully heart… we have seen condition of nainitaal, haridwaar and other places going adverse…but there are a range of places which have remained as it is..we should try to make visitors understand to remain them as it is..as beautiful l as they are… here punetha ji want to… Read more »
Mired Mirage
Guest

उमेश जी, पुनेठा जी ने तो पहाड़ियों का दर्द उघाड़ कर रख दिया है। एक एक पंक्ति में पहाड़ का सच उजागर होता है। कोई ही घर ऐसा होगा जहाँ कोई हेमा या परूली घास काटते हुए पहाड़ की भेंट न चढी हो।
घुघूती बासूती