ताज़ा रेजगारी

पर तेरा मुस्काना भर कितनों का रोशनदान हुआ

तेरे बाद ज़माना ये कुछ इस तरह हलकान हुआ
दिल्ली तेरी याद में रोई मुंबई तक वीरान हुआ
 
तेरे हिज़्र के कई दिनों तक यही समझना मुश्किल था
शहर हुआ या क़त्ल हुए अरमानों का शमशान हुआ
 
तूने अपनी एक नज़र से कितने ही दिल ढहा दिए
हाय तेरा ये हुस्न ओ ज़ालिम, हुस्न हुआ-तूफ़ान हुआ
 
ख़ुद को शायर कहने वाले तेरे इश्क़ में ख़ाक हुए
उनका तुझपर लिखना भी जैसे तेरा एहसान हुआ
 
तू तो नहीं आई पर अक्सर आती थी एक परछाई
ना जाने क्यूँ देख के उसको कुछ-कुछ तेरा गुमान हुआ
 
ख़्वाब में मैंने जिस दिन तुझको देखा था अपनी छत पर
चाँद बेचारा उस दिन मेरी चौखट का मेहमान हुआ
 
तेरे इश्क़ से जिस लड़के को चर्चे में आ जाना था
तेरी वस्ल की चाहत में उफ़ किस तरह गुमनाम हुआ
 
दुनिया वरना क्या है ? बस अंधेरी बंद दीवारें हैं
पर तेरा मुस्काना भर कितनों का रोशनदान हुआ
 
कहने वाले तो मुझको ही कहते हैं क़ातिल अपना
देख तेरे ख़ातिर अपने सर एक और इल्ज़ाम हुआ
 
एक पन्ने में लफ़्ज़ पड़े थे, एक कोने में स्याही थी
शायर के घर में क्या होता? इतना सा सामान हुआ

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