ताज़ा रेजगारी

परायेपन की बू

यूं ही अकेले साहिल पे चलते चलते
एक नाव मिली थी
लगा कि जैसे इतनी प्यारी चीज
कभी देखी ही नहीं थी
लगा कि जैसे कोई साथी
दूर तलक अब संग चलेगा।
पास गया और अपनी मरजी से
एक पतवार उठा ली
कुछ आगे तक नाव चलाने की
कोशिश भी की
पर नाव वही रुकी ही रही
डगमग करती सी।
नाव को देखा
कोई कमी या मीनमेक कुछ भी न दिखा
तभी अचानक याद आया
एक चीज नहीं थी
आसपास देखा जाकर साहिल पे तलाशा
तबसे अबतक रोज तलाशी लेता हूं साहिल की
दूसरी वो पतवार अभी तक नहीं मिली है।
शायद वो पतवार कभी भी थी ही नहीं
या फिर उसपे मेरा कोई हक ही नहीं था
कभी कभी कुछ चीजें अपनी क्यों लगती है
और फिर एकाएक ही हो जाती हैं पराई।
अब तक पैदल चलते किनारा तो अपना था
जबसे नाव दिखी है
उससे भी आने लगी है
परायेपन की बू।

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