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नैनो पर सवार कवितामय बहस

अब नैनो पर बहस कविता में सवार है। लंबे समय बाद पुनेठा जी ने अपनी इस कविता के रुप में फिर दस्तक दी है। इससे पहले इस ब्लाग को पहाड़ी बनाने में उनकी कवितामय मदद मिलती रही है। अब उनकी कविता बहस का हिस्सा बन आई है तो आप भी इसे महसूसें इसे ।
उमेश भाई ,ब्लाग निरंतर निखर रहा है। इसलिए काफी लोग इसे पढ़ और पसंद कर रहे हैं । अपनी प्रतिक्रिया भी दे रहे हैं

। ‘ नैनो’ को लेकर काफी अच्छी बहस चल रही है। आगे भी बढ़नी चाहिए । नैनो को लेकर देश भर में मीडिया द्वारा ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि जैसे नैनो के आने से भारत के आम लोगों के जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन हो जाएगा ।आखिर यह क्यों? क्या टाटा ने इस कविता में वर्णित लोगों के लिए कभी कुछ नया बनाने के लिए सोचा ?

– महेश चंद्र पुनेठा

डोली

उस दिन
जब सजायी जा रही थी डोली
दुल्हे की आगवानी के लिए
रंग-विरंगे पताकाओं से
चनरका की यादों की परतें
खुलने लगी
चूख के फाॅकों की मानिंद-
सबसे पुरानी डोली है यह
इलाके भर में
बहुत कुछ बदल गया है तब से
नहीं बदली तो यह डोली ।
न जाने कितने बेटियों की
विदाई में छलक आए
आॅसुओं से भीगी है यह डोली ।
न जाने कितने रोगियों की
अस्पताल ले जाते
कराहों से पड़पड़ायी है यह डोेली ।
न जाने कितनी प्रसवाओं को
सेंटर ले जाते
अधबिच रस्ते में ही फूटी
नवजातों की
किलकारियों से गॅूजी है यह डोली ।
सर्पीली – रपटीली पगडंडियों में
धार चढ़ते
युवा कंधों की खड़न
और चूते पसीने की सुगंध बसी है इसमें
उनके कंधों में पड़े छाले
देखे हैं इसने ।
गाॅव के हर छोटे -बड़े के
सुख-दुःख में साथ रही है यह डोली
हर किसी के
साथ रोयी-हॅसी है यह डोली ।
आज भले जल्दी ही
चिकनी- चिकनी सड़कों में
दौड़ने वाली हो लखटकिया नैनो
हमारे इन उबड़-खाबड़
चढ़ती -उतरती पगडंडियों की
नैनो तो है ,बस यह डोली ।

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