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नुक्कड़ नाटक के बाद एक और नाटक

समलैंगिकता को कितना सही कहा-ठहराया जाय ये मुददा अलग बहस का हो सकता है लेकिन हमारे समाज में समलैंगिकों के साथ होने वाला व्यवहार कतई सही नहीं ठहराया जा सकता। हाल ही में जामिया के एमसीआरसी के मासकाम्यूनिकेषन कर रहे छात्रों ने समलैंगिकता पर एक नुक्कड़ नाटक किया। पूरा नाटक इन छात्रों द्वारा लिखा और कोरियोग्राफ किया गया। बाकायदा ये पूरा नाटक टीचिंग स्टाफ के संरक्षण और दिशा निर्देशन में लिखा गया हांलाकि ये और बात है कि इसके प्रोडक्शन में टीचर्स की भूमिका महज गाईड की रही। पूरी प्रक्रिया के दौरान किसी को यह नहीं लगा कि इस नुक्कड़ नाटक के प्रदर्शन में कोई परेशानी हो सकती है। यह वाजिब भी था क्योंकि अव्वल तो यह नाटक छात्रों की रचनात्मक क्षमता को निखारने के लिए किये जाने वाले अभ्यास का हिस्सा था। दूसरा इसका लक्ष्य था नुक्कड़ नाटक के रुप में जनसंचार के एक माघ्यम को इन छात्रों को भलीभांति रुबरु कराना। और तीसरा और मेरी समझ में सबसे महत्वपूर्ण यह कि समाज के बीच मौजूद कुछ अनछुए पहलुओं को रचनात्मक रुप में लोगों के सामने प्रस्तुत कर पाने की क्षमता विकसित करना इस पूरे अभ्यास का मकसद था। एसे में समलैंगिकता का एक विषय के रुप में नाटक का रुप ले लेना एक बेहद स्वाभाविक सी बात थी। जो हुई और बेरोकटोक बढ़ी। परिणामस्वरुप दिल्ली हाट में छात्रों के इस समूह ने अपना नाटक प्रस्तुत भी किया। लेकिन इसके बाद जो हुआ वो समाज के अन्दर या कहें कि मौरलिटी के कुछ गिनेचुने ठेकेदारों की सामन्ती सोच को दर्शाने के लिए काफी था। और एक हद तक शर्मनाक भी। आरपीआई नाम की राजनैतिक पार्टी ने इस नाटक के प्रदर्शन के बाद एक विरोध प्रदर्शन किया। और जामिया के वाइस चांसलर को एक मांग पत्र भेजकर इन छात्रों और टीचर्स को बर्खास्त करने की मांग तक कर डाली। इससे ज्यादा दुखद बात यह हुई कि इस विरोध प्रदर्शन के तुरन्त बाद छात्रों को एक नोटिस देकर यह बताया गया कि इस नाटक के एक्सटर्नल इवैल्युएशन के लिये होने वाली परफोर्मेंस रद्द कर दी गई है। हांलाकि अन्ततह छात्रों के दबाव के बाद परफोर्मेंस करने की अनुमति दे दी गई।

ये घटना एक विश्वविघालय के एक सेन्टर के अन्दर घटी एक छोटी सी घटना हो सकती है लेकिन इसके कई साकेतिक अर्थ हैं। कई ऐसे मायने जो हमारी कमजोरी की परतें खोलते हैं। जो ये बताते हैं कि हम लोगों के बीच कुछ ऐसे लोगों का डर है जिन्हें अपनी राजनीति चमकाने और लाईमलाईट में आने के बेहद बेतुके तरीके अपनाने से कोई गुरेज नहीं है। जो अपने को संस्कृति का ठेकेदार तो समझते हैं लेकिन वास्तव में वे असंस्कृतिकरण या डीकल्चराईजेशन को बढ़ावा दे रहे होते हैं और रोचक बात यह है कि उन्हें इस बात का पता तक नहीं होता। संस्कृति सदैव गतिशील होती है और संस्कुतिकरण इस गतिशीलता का परिणाम होता है। ये गतिशीलता सांस्कुतिक संकुलों से मिलकर आती है। विचारों और कार्यपदधतियों में इस गतिशीलता का होना ही संस्कुतिकरण है। लेकिन इस तरह के रुढ़िवादी मानसिकता वाले लोगों के साथ परेशानी यही है कि उन्हें मौका चाहिये विरोध का। उन्हें संस्कृति की कितनी जानकारी और समाज के भले की कितनी परवाह है ये तो वे ही जानते होंगे लेकिन इस तरह की हरकतों से उनकी मूढ़ता ही नजर आती है। मुझे तो यही सच लगता है कोई बुरा माने तो माने।

जब हम लोकतंत्र की बात कर रहे होते हैं तो उसमें सबसे अहम बात होती है कि आम या खास हर तपके के लोगों की स्वतंत्रता और स्वच्छंदता किस हद तक बर्करार है? कहीं ऐसा तो नहीं कि लोकतंत्र की आड़ में किसी किस्म की छिपी हुई सामन्ती व्यवस्था में समाज के खास वर्ग को जीने को विवश किया जा रहा है? यहां स्वतंत्रता का अर्थ उत्सृंखलता या अराजकता कतई नहीं है। स्वतंत्रता के मायने इस बात से पूरे हो जाते हैं कि मैं बिना किसी के जीवन को प्रभावित करते हुए आपको आपके तरीके से जीने दिया जाय। आपके किसी जायज कदम पर कोई रोकटोक ना हो। लेकिन भारतीय समाज में फिलवक्त ऐसा है नहीं। यहां कई तरह के प्रेशर ग्रुप काम करते हैं जो जायज नाजायज तरीकों से अपनी इच्छा थोपने का काम समय समय पर करते रहते हैं। मुम्बई में उत्तरपूर्वी लोगों के साथ हुए बर्ताव से लेकर जामिया में घटी इस घटना तक की पूरी कथा इस तरह के प्रेशर ग्रुप की नाजायज हरकतों को दर्शाती हैं। हांलाकि एक लोकतांत्रिक देश में हर किसी को अपनी बात कहने का हक है लेकिन इस तरह की गतिविधियों को बढ़ावा दिये जाने का हस्र मुम्बई में देखा जा चुका है। जामिया के छात्रों द्वारा किये गये इस नाटक का सार संक्षेप यही था कि समलैंगिकों के साथ बुरा बर्ताव नहीं होना चाहिये। उन्हें भी हर आम नागरिक की तरह जीने का हक दिया जाना चाहिये। व्यक्तिगत रुप से मुझे इस संदेश पर कोई बुरी या विवादास्पद बात नही दिखाई देती। ऐसे में सबसे अहम बात यही है कि अगर आप संस्थागत रुप से सामाजिक सेदेशों को लेकर कोई कार्यक्रम कर रहे हैं तो उसे संस्थागत रुप से सहमति और समर्थन भी दिया जाना चाहिये ताकि दिये गये संदेश का महत्व बर्करार रह सके। सेदेश देने के बाद किसी तरह का विचलन वो चाहे किसी प्रेशर ग्रुप के दबाव में ही क्यों ना हो, होता है तो ना केवल संदेश का प्रभाव कमजोर हो जाता है बल्कि उन लोगों का मनोबल भी कमजोर पड़ता है जिन्होंने एक इस संदेश को देने के लिए महीनों की मेहनत की है। और फिर यदि आप सही हैं तो सच बात कहने में डर कैसा?

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5 Comments on "नुक्कड़ नाटक के बाद एक और नाटक"

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mahashakti
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यह एक बेहद जटिल विषय है जिसके उपर विस्‍तार से चर्चा हो सकती है। आज के दौर मे समलैंगिकता को सही ठहराया जा सकता है किन्‍तु वास्तविकता यह है कि आज हम और हमारा समाज इसे स्‍वीकार नही करेगा।

समलैगिको को गलत ढ़ग से देखा जाना गलत है किन्‍तु इसके लिये काफी कुछ हम ही दोषी है। समलैंगिको को लेकर आज आज समलैंगिक सम्‍बन्‍धो की बात की जाये तो यह विल्‍कुल सही नही होगा।

आपकी लेखनी में दम है। आपके ब्लाग को फिर से भ्रमण करने की तम्‍मना है।

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
Guest
नमस्कार, इसे आप हमारी टिप्पणी समझें या फिर स्वार्थ। यह एक रचनात्मक ब्लाग < HREF="http://kumarendra.blogspot.com" REL="nofollow">शब्दकार के लिए किया जा रहा प्रचार है। इस बहाने आपकी लेखन क्षमता से भी परिचित हो सके। हम आपसे आशा करते हैं कि आप इस बात को अन्यथा नहीं लेंगे कि हमने आपकी पोस्ट पर किसी तरह की टिप्पणी नहीं की। आपसे अनुरोध है कि आप एक बार रचनात्मक ब्लाग < HREF="http://kumarendra.blogspot.com" REL="nofollow">शब्दकार को देखे। यदि आपको ऐसा लगे कि इस ब्लाग में अपनी रचनायें प्रकाशित कर सहयोग प्रदान करना चाहिए तो आप अवश्य ही रचनायें प्रेषित करें। आपके ऐसा करने से हमें असीम… Read more »
लवली कुमारी / Lovely kumari
Guest

आपसे सहमत हूँ ..अभिव्यक्ति को आजादी का गला घोंटना बुरी बात है ..पर हमारे देश में बहुत से कानूनों को बदले जाने की जरुरत है.कुछ लोग विरोध करेंगे कुछ सहमत होने पर इनसे परे हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिए की किसी की स्वतंत्रता का अतिक्रमण न किया जाय. जहाँ तक मैं जानती हूँ समलैंगिकता हमारे देश में कानूनन अपराध है…इसे दिखाना अपराध नही है इसलिए यह फैसला गलत था.

Mired Mirage
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आपने हमारे समाज में व्याप्त एक बहुत बड़ी समस्या पर बात की है। जिसका मन करे जिस मर्जी बात पर प्रतिबन्ध लगवाने में ही अपनी शक्ति प्रदर्शन करता है।
घुघूती बासूती

drawings scope
Guest

वाकई इस घटना के जरिए तुमने रूढ़िवादी सामन्ती सोच और प्रगतिषील व निरन्तर परिवर्तनषील मानवीय संस्कृति के अन्तरद्वन्द को उठाया है। यहां तुमने संकेत भी दिये हैं कि समाज निरंतर प्रगतिषील है नऐ और बेहतर को स्वीकार करने वाला भी। ये किसी भी लेखक की जिम्मेदारी है और तुम्हारी पक्षधरता से सौ फीसदी सहमत हूूं। ब्लाॅग बेहतरीन बनता जा रहा है। बधाई के पात्र हो।

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