ताज़ा रेजगारी

नीद से जागा हुआ शब्द

एक दिन अचानक नीद से जागा
एक सोया हुआ शब्द
लेने लगा तेज़ तेज़ सासें
और बिखरने लगे हवा में
कई डरे हुए अक्षर
उसने अभी अभी देखा था एक सपना
जिसमें एक जंग खाती अल्मारी में
बंद थी कई कहानियां
जो वापस जाना चाहती थी
अपनी अपनी किताबों में
नौकरी नाम का वो हत्यारा
जिसका वज़न पंद्रह  घंटे से भी ज्यादा था
वक्त की छुरी से कर रहा था
एक एक कहानी की हत्या
कहानियां रोती, चीखती ,चिल्लाती
तोड़ रही थी एक एक करके दम
पर कोई नहीं था जो उन्हें सुनता
नन्ही कविताएं भी डरी सहमी
अपनी-अपनी कलमों में बैठी
कर रही थी एक ही दुआ
कि वो कभी लिखी ना जाएं
कुछ हाथ थे जो थर-थर कांप रहे थे
और स्याही धीरे-धीरे सूख रही थी
विचार अपने-अपने दिमागों में बैठे थे
सिमटे हुए
(उनपर सरकारों की निगरानी थी
उन्हें कभी भी ज़िन्दा जलाया जा सकता था)
शब्द धीरे धीरे टूट रहे थे अपने अक्षरों में
और उनके अर्थ तेजी से हो रहे थे गायब
जैसे जलाती धूप में सूख रहा हो रुका हुआ पानी
नीद से जागा हुआ वो शब्द उठा
और कुछ देर बेचैन रहने के बाद
उसने ली एक लम्बी सांस
सिरहाने से उठाकर पहनी अपनी मात्राएं
ये जानते हुए कि ये सिर्फ एक सपना नहीं था
वो निकल गया अपने काम पर
आज उसे फिर एक कविता में शामिल होना था
कल शायद किसी कहानी में …

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1 Comment on "नीद से जागा हुआ शब्द"

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Kishor Joshi (@JoshiKishor)
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हमेशा की तरह एक और बेहतरीन प्रस्तुति- “नीद से जागा हुआ शब्द” !!

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