ताज़ा रेजगारी

नजदीकियों की चाह

एक रतजगे बाद
दिन में नीद न आने की आदत सा
आंखों को जलाता वो अहसास
अब तक एक तिलिस्म लगता रहा है।
और उसी क्रम में होता रहा है महसूस
कि नजदीकियां जितनी सुखदाई होती हैं
उतनी ही व्याकुलता भरी होती हैं
नजदीकियों की चाह।

दूरियां धूल भरी सूखी हवा सी
चली आती हैं संासो में
और उनसे भागना लगता है
जैसे जिन्दगी से भागना,
पर जब नजदीकियां दूर चली जाती हैं
तो दूरियों के पास नहीं होता
पास आने के सिवाय और कोई विकल्प।

गले में खरांश सी अटकने लकती है
दूरियों की वजह
और तब ये खरांश
रोकने लगती है सांसों का रास्ता।

इस रुकावट के बीच
बेचेनियां बनाने लगती हैं लकड़ी का घर
और निराशा का दीमक कुरेदने लगता है
चैन की बंद खिड़कियों को।

होने लगते हैं दिल के भीतर कोनों में
रोज नये सुराख
और घुलने लगती है धड़कनों में
एक खास किस्म की मनहूसियत।

फासलों के बीच
अकेलेपन का जो हिलता हुआ पुल है
उसकी नीद से है गहरी दुश्मनी।
बंद आखों में जब भी
होती है फासले खत्म होने की आहट
खुल जाता है पलकों का बांध
और सारे सपने टूट कर
पानी से बिखर जाते हैं।

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1 Comment on "नजदीकियों की चाह"

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Guest

बेहतरीन