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धारावाहिकों में लौटता सामाजिक सन्देश

भारत में टेलीविजन पर मनोरंजन परक कार्यक्रमों की शुरुआत सोप ओपरा से हुई। 1985 में मनोहर श्याम जोशी द्वारा लिखा गया धारावाहिक हम लोग पहला धारावाहिक था। कक्का जी कहिन या नीम का पेड़ जैसे धारावाहिकों में सामाजिक सन्देश की महक साफ महसूस की जा सकती थी। गांव की मिट्टी की गंध लिए रोज रात बुधई दर्शकों के परिवारों के साथ अपने सुख दुख बांटता। धीरे धीरे यह फिजा बदली, धारावाहिक मध्य और उच्च वर्ग की दुनिया उकेरने लगे।
इन दिनों टीवी चैनल कलर्स पर आने वाले धारावाहिक बालिका वधू की टीआरपी चर्चा का विषय बनी हुई है। बालविवाह पर बने इस सामाजिक संदेश प्रधान धारावाहिक को दर्शकों के बीच इस हद तक लोकप्रियता मिलने से सोप ओपरा की दुनिया में नई धारा का सूत्रपात होने के संकेत मिलते दिखाई दे रहे हैं। दरअसल इस धारावाहिक ने टेलीविजन के छोटे परदे की एकसारता को तोड़ा है और एक हद तक इस धारणा को भी बदला है कि दर्शक तड़क भड़क भरी दुनिया के दिखावे का पसंद करते हैं। उन्हें सेन्सेशन, ड्रामा और सस्पेंस चाहिए। वो एक ऐसे संसार का अक्स देखना चाहते हैं जिससे असल जिंदगी में भले ही वो खुद को जोड़कर न देख सकें पर जिसे पाने की तमन्ना उनके अन्दर हमेशा कसमसाती रहती है।
दरअसल भारत के टीवी कार्यक्रमों मेंShikha Swaroop - Kahani Chandrakanta Ki gfs जब जब बदलाव हुए हैं तो वो एक ट्रेंड के रुप में हुए हैं। शुरुआती दौर में जब दूरदर्शन एकमात्र चैनल था तो उसके कार्यक्रमों में भले ही तकनीकी स्तर पर कई कमजोरियां थी पर उनमें विविधता जरुर थी। लेकिन इसके बाद टीवी चैनलों की एक बाढ़ आई। इस बाढ़ में एक चैनल ने जिस तरह के कार्यक्रमों को शामिल किया देखादेखी सारे चैनल उसे ट्रेंड बनाते चले गए। नतीजा ये हुआ कि एक समय में हर चैनल पर एक ही तरह के कार्यक्रम दिखाये जाने लगे। शुरुआत में दर्शकों के लिए चूंकि ये चीजें नई थी इसीलिए यह एकसारता भी उन्हें पसन्द आती रही लेकिन मौजूदा दौर आते आते दर्शक इस एकसारता से उबने लगे हैं।
ऐसे हुई शुरुआत
भारत में टेलीविजन पर मनोरंजन परक कार्यक्रमों की शुरुआत सोप ओपरा से हुई। 1985 में मनोहर श्याम जोशी द्वारा लिखा गया धारावाहिक हम लोग पहला धारावाहिक था। कक्का जी कहिन या नीम का पेड़ जैसे धारावाहिकों में सामाजिक सन्देश की महक साफ महसूस की जा सकती थी। गांव की मिट्टी की गंध लिए रोज रात बुधई दर्शकों के परिवारों के साथ अपने सुख दुख बांटता। धीरे धीरे यह फिजा बदली, धारावाहिक मध्य और उच्च वर्ग की दुनिया उकेरने लगे। सांस, शान्ति और स्वाभिमान सरीखे धारावाहिकों का दौर शुरु हुआ। यहां मानव सम्बन्धों की जटिलताएं, रिश्तों के बीच की उलझनें, व्यावसायिक और निजी जिन्दगी का द्वंद्व और भावनाएं धारावाहिक की कथावस्तु में समा गये। लेकिन इस दौर तक कार्यक्रमों में एक अलग सा सादापन था जो दिल को सुकून देता था। समय के साथ तिलिस्म और मिथक भी धारााहिकों का हिस्सा बन गये। कमलेश्वर द्वारा लिखित चंद्रकान्ता को देखने के लिए लागों में एक रोमांच दिखाई देने लगा। इसी सिलसिले में अलिफ लैला, विक्रम बेताल जैसे धारावाहिक भी दर्शकों की पसंद बने जा मिथकीय कथाओं पर आधारित थे। इसके समानान्तर धार्मिक धारावाहिकों को को भी दर्शकों के बीच लोकप्रियता मिली। रामानंद सागर के निर्देशन में बने रामायण, महाभारत और जय हनुमान जैसे धारावाहिकों की टीआरपी आसमान छूने लगी। इस दौर के बाद एक नया जौनरा धारावाहिकों से जुड़ा। इस कड़ी में तहकीकात, राजा रैन्चो और व्योमकेश बख्सी जैसे धारावाहिक थे जिन्हें डिटैक्टिव या जासूसी धारावाहिकों की स्रेणी में रखा गया। इसी बीच भारत का पहला सुपर हीरो शक्तिमान भी लोकप्रियता के आयाम चढ़ने लगा। टीवी धारावाहिकों में हो रहे ये अभिनव प्रयोग विकासक्रम का हिस्सा थे। लगातार नई विधाओं से रुबरु होते दर्शकों का इसे स्वीकारते चले जाना स्वाभाविक भी था।

बदलाव में गुम गई वास्तविकता

छोटे परदे की दुनिया में एक बड़ा बदलाव 90 के दशक में आया जब सेटेलाइट चैनलों का भारत में प्रसारण किया जाने लगा। एक के बाद एक नये चैनल आने लगे। दर्शकों के लिए यह सब किसी अजूबे से कम नहीं था। ऐसे में इस परिवर्तन से उन्हें उम्मीदें भी कुछ ज्यादा थी। लेकिन एक हद तक छोटा परदा इन उम्मीदों पर ख्रा नहीं उतर पाया। हर चैनल पर एक ही तरह के कार्यक्रमों ने दर्शकों को निराश किया। एकता कपूर के सास बहू सीरियल शुरुआत में तो दर्शकों खासकर गृहणियों को खूब रास आये लेकिन धीरे धीरे इनमें दिखाये जाने वाले संयुक्त परिवार,, उनके षड़यंत्र, रंजिश, बिखरते रिश्ते, पुनर्जन्म और दिखावे की अतिरंजना से उन्हें भी अपच होने लगी है। अतिरंजना तब और हास्यास्पद होने लगी जब एक फार्मूले की तरह एक चैनल की कथावस्तु और यहां तक कि पात्रों केा दूसरे चैनल के धारावाहिकों ने नकल करना शुरु कर दिया। हांलाकि इस दौर में तकनीक का भी जबर्दस्त विकास हुआ। नयनाभिराम सेट्स, बीसियों कैमरा एंगल, साउन्ड क्वालिटी और बालिवुड के गाने धारावाहिकों में शुमार हुए। लेकिन इसके बावजूद दर्शकों को जो बात कहीं गुम नजर आई वो थी वास्तविकता। ऐसे में जाहिराना तौर पर यह सवाल उठ खड़ा हुआ कि क्या टीवी धारावाहिक हमारे समाज की सच्चाई को दर्शकों के सामने रख रहे हैं। या यह सब उनके द्वारा गढ़ी हुई एक वर्चुअल रियालिटी है। एक झूठा यथार्थ।
गायब रहा आम आदमी
इस दौर के टीवी धारावाहिकों में गांवों को बीच बीच में शामिल किया जाता रहा। लेकिन उनका चित्रण या तो घूमने की जगह के तौर पर हुआ जहां जाकर शहरी युवा भोले भाले ग्रामीणों का मजाक बनाते हुए मस्ती भरे कुछ पल गुजार आते या फिर ग्रामीण चरित्रों को धारावाहिकों में शामिल करके उन्हें अनपढ़, गंवार और हंसी का पात्र बनाकर पेश किया गया। अधिकांश धारावाहिकों ने गांवों की समस्याओं का समझने-समझाने की कोशिश कभी नहीं की जैसा कि शुरुआती दौर के धारावाहिक करते आए थे। शहरी निम्न वर्ग भी धारावाहिकों से हमेशा गाायब रहा। हांलाकि मुसद्दी लाल सरीखे कुछ निम्न वर्गीय चरित्र एकआध बार अपनी रोजमर्रा की समस्याओं के साथ टीवी पर दिखाई दिये लेकिन ये प्रयास सीमित रहे जबकि इनकी जरुरत कही ज्यादा थी। घिसे पिटे मसाले और मौजूदा टेंªड के चलते धारावाहिकों में सामाजिक संदेश कहीं धूल फांकता भी नजर नही आया।
लेकिन जिस तरह से बालिका वधू जैसे धारावाहिक ने लोगों के बीच अपनी पकड़ बनाई है उसे देख यही लगता कि धारावाहिकों में लोग सादगी चाहते हैं। वो लाउड म्यूजिक के साथ सेन्सेशन पैदा करते संवादों और साजिशों से परे लोकसंगीत से पगे ऐसे वास्तविक ड्रामा को टीवी पर देखना चाहते हैं जिसकी विषयवस्तु समाज के बीच से उपजी हो, जिसमें सचमुच अपनेपन की बू हो। धारावाहिकों के मौजूदा ट्रेंड से उपजी नाउम्मीदी में इसे आशा की किरण के रुप में देखा जा सकता है।

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3 Comments on "धारावाहिकों में लौटता सामाजिक सन्देश"

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