ताज़ा रेजगारी

दो महीने की बातें

धरना-वर्ना, जंतर-मंतर, दिल्ली तक ही चलता है
बाकी का सच गोली की बौछारों में छुप जाएगा

जो छाती तान के सामने आएगा उसको मरना होगा
जिसको जीना होगा वो हत्यारों में छुप जाएगा

चौबीस घंटे खबर चलेगी अलग-अलग अल्फाजों में
सड़कों पर जो खून बहा था नारों में छुप जाएगा

सोमवार से शनिवार तक जमकर वाद-विवाद करो
दो दो पैग लगाकर सब इतवारों में छुप जाएगा

जो विरोध में मुह खोले उसको ‘अश्लील’ बता देना
बाकी बचा खुचा तबका ‘परिवारों’ में छुप जाएगा

पैसे ले दे कर ही सबके दाग यहां तय होते हैं
सच का क्या है चुपके से अखबारों में छुप जाएगा

‘मंदिर’, ‘मस्जिद’, ‘आम आदमी’ दो महीने की बातें हैं
जीत के जो भी आएगा सरकारों में छुप जाएगा

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1 Comment on "दो महीने की बातें"

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Aastha Manocha
Guest

Very nice.

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