ताज़ा रेजगारी

देखकर भी न देखना

मैं अपने शरीर को
जंग लगे पुर्जों में ढ़लता हुआ देखता हूं
मैं खुद को उतना ही देखता हुआ देखता हूं
जितना देखकर मुझे देखने से डर न लगे
मैं अपनेआप को जंग में गोलियां खाते नहीं देखता
भीड़ में लाठियां भांचते उस पुलिस वाले को नहीं देखता
जो मुझे देखता हो बर्बर निगाह से
ट्रेफिक वाले को रिश्वत लेता हुआ देखकर भी
मैं देखता हूँ ऐसे जैसे मैंने कुछ न देखा हो
मैं नदी देखता हूं, समुद्र देखता हूं,
जंगल देखता हूं, पहाड़ देखता हूं
पर देखकर भी अनदेखा कर देता हूं इन्हें लूटने वाले को
वो जो नदियों में बाँध बनाता है
जंगलों में इमारतें उगाता है
सहारा बनकर बेसहारा करते उस आदमी को मैं नहीं देखता
बेसहारा होते उन लोगों को मैं नहीं देखता
जो मुझे, उन्हें इस तरह देखते हुए देखते हैं,
जैसे मैंने उन्हें देखा ही न हो
मैं उनकी निगाह से देखता हूं
जिनकी निगाह दुनिया को देखती है मुनाफे की नज़र से
मुझे आइना देखकर मुनाफा नज़र नहीं आता
मेरे घर से उस रोज़ जो चटखने की आवाज़ आई थी
वो आईने की भी हो सकती है और मेरे वजूद की भी
मुझे नहीं पता,
मैंने पढ़ लिख कर बहरा होना सीख लिया है
ठीक वैसे जैसे देखकर भी न देखना
मेरी ज़िंदगी उस मरते हुए सपने की तरह है
जो नीद की दीवारों को लांघकर
देखना चाहता है जागने का खुला आसमान
पर इस बात को अनदेखा कर
मैं अपनी आँखों से किसी और का सपना देखता हूं
और अपने सपने को ऐसे देखता हूँ,
जैसे वो कभी मेरा था ही नहीं

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2 Comments on "देखकर भी न देखना"

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leena goswami
Guest

जितनी भी तारीफ करूँ आपके लेखन की कम ही पड़ेगी ……. जो भी लिखते है सीधा दिल को कुरेद देता है अपना ही वजूद सवालों से घिरा महसूस होता है ऐसे ही लिखते रहिये शायद जवाब भी आपके गुल्लक में जमा सिक्के दे दें।

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