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दांये या बांये देखने के बाद

यहां मुम्बई में बैठे दायें या बायें देखते हुए एक कार थी जो पहाड़ के एक गांव कांडा के कलाकेन्द्र तक छोड़ आई। ये पूरा सफर बहुत ही आत्मीय था। चीजें जब आम्मीय होती हैं तो हम उनकी खामियों को अनदेखा कर देते हैं। बेला नेगी की दांयें या बांये देखने के बाद अनदेखियां करने का मन होता है।

एक समय था जब अपनी मां के साथ बागेश्वर के पास के उस कांडा गांव में जाना होता था। मैं थक जाता था। वो नहीं थकती थी। मां कहती थी कि बस बेटा अब थोड़ा और चलना है। और उस थोड़ा चलने के दौरान मैं मां के साथ मीलों चलता चला जाता। मांएं हमें थोड़ा चलना सिखाती हैं तभी तो हम बहुत चलना सीख पाते हैं। खैर इस बार दीपक डोबरियाल के साथ वहां जाना हुआ। तब असल में जाते हुए और अबकी इस फिल्म के जरिये जाते हुए जीजें बस उतनी ही फर्क थी कि तब वो सामने थी दूर दूर तक खुली और इस बार एक स्क्रीन में कैद, एक फिल्म की शक्ल में। उसी तरह की औरतें, कमर तोड़ काम करती हुई, सौल कठौल करती हुई। उसी तरह के आदमी, जुंआ खेलते, शराब पीते, चुगली करते हुए। उसी तरह के बूढे़ निराश हताश होते पहाड़ चिन्ता करते हुए। उसी तरह के बच्चे नासमझी में शैतानियां करते और समझदारियों में गांव के सपने पूरे करते हुए। और एक गधा जो अपने सर पे गांव के लिये कुछ नया और अलग करने का बोझ लादे आंखिर अपनी मंजिल तक पहुंच ही जाता है। और मंजिल पाते ही वो कार उसके लिये बेकार हो जाती है।
दांयें या बांयें का कथानक बहुत अलग नहीं है। पर रोचक है। वंडर कार, राजू चाचा, दो दूनी चार इन जैसी फिल्में पहले भी बन चुकी हैं जिनमें किसी न किसी प्रकार से कार अहम भूमिका निभाती दिखी है। लेकिन यहां इस फिल्म में परिस्थितियां उसकी भूमिका को कुछ अलग कर देती हैं। उत्तराखंड का एक ऐसा सुदूरवर्ती गांव जहां एक टूटी फूटी सड़क  आधी अधूरी पहुंचती हैं, उस गांव में बंबई से लौटा एक आदमी अचानक इसलिये हीरो हो जाता है क्योंकि उसे एक जिंगल प्रतियोगिता में एक बड़ी सी लाल कार उपहार में मिलती है। रमेश माझिला के गांव में कलाकेन्द्र खुलवाने के जिस सपने का सारे गांव वाले पहले मजाक उड़ाते थे अब कार आ जाने से उस सपने को थोड़ा थोड़़ा सपोर्ट मिलने लगा है। रमेश माझिला गांव के स्कूल के जिन बच्चों को पढ़ाता है उनमें से कुछ की आंखें कला केन्द्र के सपने से जुड़ जाती हैं। बच्चे जब जिद पे आते हैं तो जिदें घुटने टेकती पूरी हो ही जाती हैं।
फिल्म का पहला और तीसरा एक्ट देखने वाले को बांधे रखता है। पर दूसरे एक्ट में फिल्म लड़खड़ाती नज़र आती है। इस एक्ट में फिल्म छोटे छोटे वाकयों से पहाड़ को उकेरने की कोशिश करती है। लेकिन ये वाकये थोड़ा भागते से नज़र आते हैं। उनमें थोड़ा सा ठहराव की कमी नज़र आने लगती है और कुछ बनावटीपन भी। लेकिन फिल्म के साथ जो सबसे अच्छी बात है वो ये कि एक एक कैरेक्टर का मैनरिजम न केवल अलग से दिखाई देता है, बल्कि अपने अनौखेपन में दर्शकों पर छाप भी छोड़ता है। अगर आप पहाड़ के गांवों में गये हैं तो आपको ये पात्र असलियत के बहुत ही करीब मिलेंगे। उनके बोलने चालने का ढंग, उनका रहन सहर, उनकी नीयतें, सब कुछ ऐसी ही तो होती हैं। रमेश माझिला जो शहर तो गया पर उतना शहरी नहीं हो सका, उसकी मध्य वर्गीय मानसिकता वाली पत्नी हेमा जिसे गहने बेचकर ही सही अपने भाई को दिखाना है कि वो भी किसी से कम नहीं हैं, हेमा का भाई एक पहाड़ी जो शहर गया और फिर पहाड़ में रहने वालों को गंवार और तुच्छ समझने लगा। ओखल कूटती, घास काटती, अपनी मजबूरियों और दुखों के बीच भी चुप और खुश रहती औरतें। शराब में धुत रहने वाले जुआरी आदमी और लड़के, शरमाई शरमाई सी पर इच्छाओं से भरी लड़कियां, और वो बूढ़ा आदमी जिसे खड़िया की खान में हो रही खुदाई के चलते जल , जंगल और ज़मीन के खत्म हो जाने का डर है। खान माफिया और अवसरवादी पर असफल छोटी सोच वाले छुटभैयये नेता। पहाड़ के सच के बहुत करीब से लगते हैं ये लोग। बेला नेगी ने जिस तरह से उन्हें फिल्म में स्थापित कर दिया है वो एक कठिन और बेहतरीन काम लगता है। स्थानीय लोगों को फिल्म के पात्रों के रुप में शामिल करने का उनका फैसला समझदारी भरा लगता है, वरना शायद फिल्म इतनी रियलिटिक सी नहीं लगती।
आंेकारा, गुलाल, जैसी फिल्मों में अपनी एक्टिंग से अलग मुकाम बनाने वाले दीपक डोबरियाल दांये या बांये में फिर अपनी एक्टिंग का लोहा मनवाते हैं। यहां वो एक परफैक्ट गधे की भूमिका निभाते हैं जो गांव वाले लोगों को अपने बच्चों को गधा कहने से रोकता है इस बात की जानकारी के बिना कि यहां तो लोग उसे ही गधा समझ बैठे हैं। उनके व्यक्तिगत स्वाभाव का असर ही होगा शायद, कि वो फिल्मों में भी उतने ही सहज और सरल नज़र आते हैं जितने वो असल ज़िन्दगी में हैं। वर्सोवा के पास उनसे हुई एक छोटी सी मुलाकात में समझ आया कि दीपक असल जिन्दगी में भी फेक होने से बचते हैं इसीलिये नेक एक्ंििटग कर पाते हैं।
फिल्म की शूटिंग भी पहाड़ में ही हुई है। इसलिये उसकी लोकेशन भी फिल्म को रियल होने के नजदीक लाती है। गांव के पाखे वाले दो मंजिला घर, नीले रंग की पुताई की हुई लकड़ी की खिड़कियां, घर के आगे एक छोटा सा पत्थरों के फर्श वाला आंगन, आंगन में बधी गाय भैंसे, एक ओखल। और गहरे नीले साफ आसमान के नीचे घने जंगलों के बीच दूर दूर छिंटके से घर।
अगर आपने कभी मनोहर श्याम जोशी को पढ़ा हो तो ऐसा होने वाला हुआ बल, ऐसा कहां होने वाला ठैरा, रमेश की जगह रमेस दा टाईप के संवादों से आप अच्छी तरह वाकिफ होंगे। उन्होंने अपने क्याप, कसप, हरिया हरक्यूलिश की हैरानी जैसे उपन्यासों में पहाड़ियों के इस खास बोलने के लेहजे को खूब पकड़ा है। दांयें या बांये इस ठेठ पहाड़ी एक्सेन्ट के लिहाज से मनोहर श्याम जोशी की याद दिला देती है।
बजट की कमी फिल्म के लुक को काफी प्रभावित करती सी लगती है। यही फिल्म बड़े बजट और ज्यादा संसाधनों में बनती तो शायद और बेहतर हो पाती। पर पहले प्रयास के रुप में देखें तो बेला नेगी को बधाई जरुर मिलनी चाहिये। पहाड़ को मेन स्ट्रीम की फिल्मों में अक्सर एक आउटसाईडर के पौइन्ट औफ व्यू से ही दिखाया जाता रहा है। एक छुट्टी बिताने की खूबसूरत जगह की तरह। दांये या बांये मेरी समझ से ऐसी पहली फिल्म है जिसने पहाड़ को एक पहाड़ी की नज़र से देखा है।, उस खूबसूरत दुनियां में मौजूद अभावों पर गौर किया है, उसकी समस्याओं को समझा है और एक हद तक समाधान देने की कोशिश की है। शराब जो शहर महिलाओं का रिक्रिएशन होती है वही शराब पहाड़ की औरतों पर कितनी भारी पड़ जाती है, खनन माफियाओं के चंगुल में फंसे पहाड़ के जंगल कैसे संकट के दौर से गुजरने लगे हैं, बेकारी और बेरोजगारी कैसे गांवों से पलायन की वजह बन जाती है, फिल्म इन मुद्दों को बहुत मनोरंजक तरीके से उठाती है। रमेश माझिला के स्कूल में दिये गये भाषणों को छोड़ दे ंतो फिल्म कहीं प्रीची नहीं लगती। वो सिखाती नहीं है, आपसे बात करती है, पूरी पर्वतीय आत्मीयता के साथ।
उम्मीद है कि बेला नेगी जैसे कुछ लोग अपने दांये या बांये झांकते हुए पहाड़ को फिल्माकर समझने समझाने की आगे और कुछ बेहतर कोशिशें करेंगे। मौका लगा तो हम भी जरुर उन कोशिशों में भागीदार होंगे। उम्मीद तो है…..देखें…..

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1 Comment on "दांये या बांये देखने के बाद"

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piyush
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yar movie dakhene k baad aur ye padne k baad mai ye kahungaa ki comment karne k layak to mai hou nahi par mivie mai meri vo sanskriti dikhai thi jise mai bhoolta ja raha tha iske baad mai apne goan jaroor gaya aur ye sab kuch talassane ki kosis ki jo aab hamara hissasa hone k baad bhi hum bhulta ja rahe hai

piyush

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