ताज़ा रेजगारी

तुम्हारा ख़्याल

गर्मियों में सूखते गले को
तर करते ठंडे पानी-सा
उतर आया ज़हन में।
और लगा
जैसे गर्म रेत के बीच
बर्फ की सीली की परत
ज़मीन पर उग आई हो।

सपने,
गीली माटी जैसे
धूप में चटक जाती है
वैसे टूट रहे थे ज़र्रा-ज़र्रा
तुम्हारा खयाल
जब गूंथने चला आया मिट्टी को
सपने महल बनकर छूने लगे आसमान।

तुम उगी
कनेर से सूखे मेरे खयालों के बीच
और एक सूरजमुखी
हवा को सूंघने लायक बनाता
खिलने लगा खयालों में।

पर खयाल-खयाल होते हैं।
तुम जैसे थी ही नहीं
न ही पानी, न मिट्टी, न महक।
गला सूखता सा रहा।
धूप में चटकती रही मिट्टी।
कनेर सिकुड़ते रहे
जलाती रेत के दरमियान।
और खयाल………..?

औंधे मुंह लेटा मैं
आंसुओं से बतियाता हूं
और बूंद दर बूंद
समझाते हैं आंसू
के संभाल के रखना
जेबों में भरे खूबसूरत खयाल
घूमते हैं यहां जेबकतरे।

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