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ट्रेन के छूटने का वक्त

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कुछ रिश्ते
जैसे बहुत जल्दी बहुत पास आ जाते हैं
आते हैं लेकर
जरा सी फिक्र, जरा सा प्यार, जरा जरा अपनापन भी

कुछ रिश्ते जैसे उन एक दिन के मेहमानों के से होते हैं
जिनको छोड़ आते हैं हम स्टेशन
जो चढ चुके होते हैं ट्रेन में
जिनसे कह चुके होते हैं हम अलविदा
ना चाहने के बावजूद हो चुका होता है
जिनकी ट्रेन के छूटने का वक्त
घुल जाता है हथेली की रेखाओं में कहीं
जिनके हाथों का स्पर्श
रह जाती है आंखो में अलविदा कहती मुस्कान
छूट जाती हैं पीछे दो खाली पटरियां
तकती हुई जिनकी वापसी की राह

कुछ रिश्ते
जैसे बहुत जल्दी दूर चले जाते हैं
छोड़ जाते हैं पीछे
जरा सी कसक, जरा सा इंतजार, जरा जरा अधूरापन भी

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1 Comment on "ट्रेन के छूटने का वक्त"

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राकेश कौशिक
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कभी कभी तो देख किसी को हृदय पुष्प खिल उठता