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जिन्दगी की कोचिंग क्लास हैं स्टीव जौब्स की बातें

स्टीव जौब्स का व्यकितत्व मुझे जिन्दगी की कोचिंग क्लास की तरह लगता है। उनके बारे में पढ़ते चले जाना जि़न्दगी को सीखते चले जाने की तरह है।
आविष्कार ही वो चीज़ है जो एक लीडर को एक फौलोवर से अलग करती है। स्टीव जौब्स की कही ये बात इसलिये अहम हो जाती है क्योंकि उन्होंने जो कहा वो अपने खुद के अनुभवों के आधार पर कहा। उनकी कही हर बात को उनकी जिन्दगी के अलग अलग हिस्सों में झलकते हुए देखा जा सकता था।
Published in I-Next, 5-9-12
एक छोटे से गैरेज की चाहरदीवारी से की हुर्इ एक छोटी सी शुरुआत कैसे पूरी दुनिया को चौंका देती है, और फिर चौंकाने का एक सिलसिला सा शुरु हो जाता है, दुनिया उस आविश्कारक के पैदा किये हुए एक मिराज से निकल भी नहीं पार्इ होती है, कि वो दूसरा मिराज सामने खड़ा कर देता है, फिर तीसरा फिर चौथा और ये सिलसिला उस आविश्कारक की आंखिरी सासें लेने तक नहीं थमता।
तकनीक की दुनिया में एप्पल और स्टीव जौब्स आज एक्सीलेंस के पर्यायवाची माने जाते हैं। दुनिया का सबसे बेहतरीन पर्सनालार्इज्ड कम्प्ूटर बनाने वाले उस आदमी को तकनीक की दुनिया का भगवान बनाने के पीछे जो एक चीज़ सबसे बड़ी भूमिका निभाती है वो है उसका विज़न।
स्टीव जौब्स ने अपने बारे में लिखा है कि पिछले 33 सालों से जब भी मैं आर्इने के सामने खड़ा होता हूं, मैं यही सोचता हूं कि आज अगर मेरा आंखिरी दिन होता तो क्या मैं वही कर रहा होता जो मैं आज करने वाला हूं। मेरा जवाब अगर ना में होता है तो अगले कर्इ दिनों तक मुझे पता होता है कि मुझे किसी बदलाव की ज़रुरत है।
हम अक्सर अपनी निज़ी जि़न्दगी में आये दुखों का हवाला देकर अपनी सारी असफलताओं और हताशाओं को जसिटफार्इ करने की कोशिश करते हैं। स्टीव जौब्स की जि़न्दगी की कहानी पलक झपकते ही अपनी असफलताओं के पीछे दी गर्इ हमारी दलीलों को सिरे से खारिज कर देती है। स्टीव जौब्स के पैदा होने से पहले ही उनके माता पिता उन्हें किसी और को गोद देने की कागज़ी कार्रवार्इ कर चुके थे। एडौप्शन के कागज़ों पर सार्इन करते वक्त जब उनके नये माता पिता को पता चला कि उनके बायलौजिकल पैरैन्टस ग्रैजुएट नहीं हैं तो उन्होंने उस नवजात को ये सोचकर गोद लेने से मना कर दिया कि स्टीव जौब्स भी पढ़ने लिखने में कमज़ोर निकलेंगे। लेकिन उन्हें क्या पता था कि वो एक जीनियस को गोद लेकर तकनीकी दुनिया के स्वर्णिम इतिहास का हिस्सा बन रहे हैं।
कुछ ऐसा ही तिरस्कार उन्हें तब भी झेलना पड़ा जब एप्पल ने उन्हें नौकरी से निकाल दिया। जान स्कली नाम के जिस शख्स को उन्होंने एप्पल में जगह दी उसी शख्स ने स्टीव जौब को पिंक सिलप देकर उन्हें कम्पनी के बाहर का रास्ता दिखा दिया।
लेकिन अपने जन्म से पहले ही तिरस्कृत कर दिये गये उस शख्स ने केवल 56 सालों की अपनी जीवनयात्रा में ये साबित कर दिया कि वो तिरस्कार के नहीं बलिक सर आंखों पर उठाये जाने के हकदार थे।
आज स्टीव जौब्स का नाम लिये बिना तकनीकी जगत की शब्दावलियां अधूरी रह जाती हैं। उन्होंने जिस इंटेलिजैंस से कम्प्यूटिंग की उलझी हुर्इ तकनीकों को छोटे छोटे डब्बों में समेट दिया वो उनके जैसा कोर्इ जीनियस ही कर सकता था। आर्इ पौड, आर्इ पैड और आर्इ फोन जैसे जादुर्इ तकनीकी आविष्कारों को सम्भव बनाते समय स्टीव जौब्स की सोच यही रहती थी कि जो वो बना रहे हैं उससे बेहतर कोर्इ सोच भी ना सके। वो अपने इंजीनियर्स को अक्सर यही कहते थे कि जो हम बना रहे हैं उसके लिये लोग केवल टैम्प्ट ही न हों बलिक वो चीज़ इतनी खूबसूरत हो कि लोगों का उसे चाटने तक का मन हो। ये बात सुनने में कुछ अटपटी लग सकती है पर इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि वो अपने उत्पादों में किस स्तर की क्वालिटी देखना चाहते थे। वो मानते थे कि आप अपने ग्राहकों से ये नहीं पूछ सकते कि वो क्या चाहते हैं और फिर आप उसे वो बना के दें जो वो चाहते हैं। क्योंकि जब तक आप उनकी पसंद का प्रोडक्ट उन्हें बना के देंगे तब तक वो कुछ नया चाहने लगेंगे। शायद इसी समझ ने उन्हें समय से बहुत आगे तक की सोचने की काबिलियत दी। और इसी काबिलियत के बूते उन्होंने अपने कस्टमर्स को वो प्रोडक्ट बना के दिये जिनकी कल्पना भी उनकी समझ से बहुत दूर थी।
अपने समय से आगे सोचने वाले स्टीव जौब्स हमेशा ये मानते रहे कि आप केवल आगे देखकर बिन्दुओं को नहीं जोड़ सकते। उन्हें जोड़ने के लिये आपको पीछे देखना होगा। और ये भरोसा रखना होगा कि भविष्य में उन्हें जोड़ा सकता है। आपको किसी चीज़ पर भरोसा रखना होगा। चाहे आप उसे भाग्य कहें, जि़न्दगी कहें या अपने कर्म।
स्टीव जौब्स कहते थे कि आपका समय सीमित है इसे किसी और की जि़न्दगी जीने में व्यर्थ मत करो। अपने बारे में दूसरों की बनार्इ हुर्इ राय से पैदा हुए भ्रम के जाल में मत फंसो। दूसरे लोगों की राय से पैदा हुए शोर के सामने अपने भीतर की आवाज़ को मत दबने दो। और इससे भी ज़रुरी है कि इतना साहस रखो कि अपने दिल और अपने इन्टयूशन दोनों की बात मान सको।
अपने आंखिरी वक्त में कैंसर से जूझते हुए स्टीव जौब्स जानते थे कि उनके पास बहुत कम वक्त बचा है। शायद कुछ महीने। इसीलिये वो वक्त को अपनी पसंदीदा चीज़ों में मानते थे। उन्होंने हर दिन को अपनी जिन्दगी का आखिरी दिन माना इसीलिये उन्हें एक एक लमहा ज़रुरी लगता रहा। उन्होंने कहा भी था कि मेरी जिन्दगी की सबसे पसंदीदा जीजें पैसे से खरीदी हुर्इ चीज़ें नहीं हैं। हमारी जिन्दगी का जो सबसे कीमती रिसोर्स है वो वक्त है।

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1 Comment on "जिन्दगी की कोचिंग क्लास हैं स्टीव जौब्स की बातें"

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Shashiprakash Saini
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बहुत बढ़िया लिखा है आपने

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