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जन्नत की हकीकत

ऊंची सियासत ने की
बड़ी गलतियां
और कश्मीर कश्मीर हो गया।

दिखाये गये
धरती पर स्वर्ग के सपने
पर स्वर्ग बन पाने की सभी शर्तें
दमन की कब्र में दफना दी गई।

पीने लगे कश्मीरी
आजादी के घूुट
फूंक फूंक कर।
देखने लगे आजादी के
तीन थके हुए रंग।
ढ़ोते हुए आजादी को
किसी बोझ की तरह।

फीका लगने लगा गुलमर्ग
स्ंागीनों के साये में।
लगने लगा सुर्ख
डल झील का पानी।

बर्फ की सफेदी के बीच
पसरता रहा स्याह डर।
दबती रही चीखें
पर्वतों के बीच
सिकुड़ती रही औरतें अपने घरों में।

दो पाटों के बीच
पिस जाने की परंपरा
बनने लगी कश्मीरियत।

तय करता रहा लोकतंत्र
कश्मीर की इच्छाएं
अपने नजरिये से।
जीता रहा कश्मीर
गुलामी के लोकतंत्र में।

ये एक भीड़ का दर्द है
या जन्नत की हकीकत
हिन्दुस्तान की धरती पर
दिल को कचोटती
गूंज रही हैं कुछ आवाजें
जीवे जीवे पाकिस्तान।

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1 Comment on "जन्नत की हकीकत"

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Hashmi
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