ताज़ा रेजगारी

छाताएं और बारिशें

आसमान से लगातार कुछ ऐसा बरसता रहा जिसके लिए ज़मीन का सबसे गर्म टुकड़ा सबसे ज़्यादा तरस रहा था। 
 
बारिश न होती तो कुछ अनाम पत्तियाँ जो दीवार होते जा रहे शहर की किसी बेजान सी खिड़की में ग़लती से उग आई थी, मुरझा गई होती। क्युंकी शहर में उसकी फ़िक्र करने का मौसम अब कभी नहीं आता। फ़िक्र है। फ़िक्र को कुछ नहीं हुआ। वक़्त को हो गया है। वक़्त नहीं है। वक़्त नहीं है क्युंकि ये अपने-अपने वक़्त का इंतज़ार करते लोगों का शहर है। चौराहे पर रोज़ वो जिस बत्ती पर जाम में फँसते हैं वो बत्ती अब ज़हन में भी चस्पा हो आई है। लेकिन उसमें लगातार एक पीली रोशनी जगमगाती रहती है। और एक अस्वाभाविक सा इंतज़ार होता है जो इस तरफ़ खड़ा स्वाभाविक लगने की बदस्तूर कोशिश कर रहा होता है। हम उस इंतज़ार की ऊँगली पकड़े न जाने कबसे खड़े धूल भरी धूप में झुलसते जाते हैं। हम खीझते-चीख़ते- मुरझाते और अपनी-अपनी हारी हुयी थकानों में नींद की नदी में डूब जाते हैं। सुबह ख़ुद को डूबने पर भी बच गया पाना हर नए दिन की एक पुरानी उपलब्धि बन जाता है। कई उपलब्धियाँ अपने साथ संतोष लेकर नहीं आती। 
 
और फिर ठीक ऐसे वक़्त में आसमान से बूँदें टपकती हैं। हम उन्हें परेशानी बनाने की लाख कोशिश करते हैं, लेकिन हमारे कपड़ों पर लगे कीचड़ के छींटे भी बारिश की उन बूँदों में दाग़ नहीं लगा पाते। मैं अक्सर सोचता हूँ कि ऐसा क्यूँ होता है कि आसमान से जो चाँदी बरसता है नीचे हमारी धरती पर पहुँचते पहुँचते तमाम रंगों में बदल जाता है। जैसी मिट्टी-वैसा रंग। मैं अक्सर उस रंगहीन उजले पानी को ज़मीन पर गिरने से पहले अपनी आत्मा में सोख लेना चाहता हूँ पर लाख कोशिशों के बाद भी उसकी तरलता मेरे दिल में अपनी जगह नहीं बना पाती। इस शहर में जो मिलावटी धूप तैरती है वो हमारी तरलताओं को सोख लेती है। और हमारा लगातार खुरदरा और पथरीला होता जाता दिल असमंजस में आ जाता है। लोगों के दुखों पर आँखों का न भीग आना ही कम था कि अपने दुखों पर उपजती नमी भी कहीं खो गई है। सुख जैसे किसी छोटे कड़ाहे में बच गया रस हो जिसको कई-कई लोग अपनी अपनी कटोरियों में एक साथ भरने के लिए लड़ रहे हों और सबकी कटोरियों में बस खुरचनें भर रही हों। और रस बस इतना ही कि अगली सुबह तक हवा भर से सूख जाए। अगली सुबह फिर वही लड़ाई। सुख के रस की चाह में खुरचनें बटोर लेने की लड़ाई। सबकी कटोरियाँ धीरे-धीरे किनारों से टूट रही हैं। जब तक कटोरी भर रस भरने के दिन आएंगे तब तक वो उस लायक ही कहाँ बचेगी ? अपनी देह की कटोरी में कितनी दरारें हैं उनको देखने के लिए कोई आइना कभी बन पाएगा क्या?   
 
बारिशों का आना उस तरलता की उम्मीद लेकर आता है जिसके होने से ज़िंदगी कुछ आसान बनी रहती है। लेकिन उफ़! हमारे भीतर घर कर गई ये कठोरता। हमें कमरों में बंद रहना है। खिड़कियाँ खोलने की हमारी आदतें जाती रही हैं। अपने ही बारामदों में, अपनी ही लगाई लोहे की सीखचों तक सीमित हमारा दायरा। हम सबकुछ छिपकर कर लेना चाहते हैं। और बारिशें, वो कभी छिपकर नहीं आती। चौतरफ़ा खुले आसमान से सरेआम टपकती हैं। और  ये आज़ादी हमें रास नहीं आती। कुछ खटकता है इस आज़ादी में। दफ़्तरों के कोंट्रेक्ट में मिली वक़्त की पाबंदी हमने अपने जीवन पर भी लागू कर दी है। किसी अनाम की गुमनाम शर्तें हमें वो करने से रोकती चली जाती हैं जो हम करना चाहते हैं। लगातार कोई बेशक्ल, बेनाम किसी अनजान जगह पर बैठा हमें टोक रहा होता है। अदृश्य शक्लों में हमारा डर लगातार हमें मूक होकर टकटकी लगाए देखता टोकता रहता है। हम जो करना चाहते हैं, मसलन बारिशों में भीगना। लेकिन हमने किया ये कि बारिशों से बचने के लिए ऐसी छाताएँ बना ली हैं जो इतनी छोटी हो जाती हैं कि हमारी जेबों में समा जाती हैं। कई बार जब बारिश नहीं भी हो रही होती और हमारी जेबों में छाते नहीं होते तब भी बारिश की शंकाएं हमारी जेबों में डर की अदृश्य छाता डाल देती है। हम जेबों में हाथ डालकर खड़े मुस्कुरा रहे होते हैं लेकिन भीतर ही भीतर हम अपने हाथों से उस डर की गर्दन दबोच कर उसे मार डालने की असफल कोशिश कर रहे होते हैं। डर जितनी आसानी से पैदा हो जाता है वो उतनी आसानी से कहां मरता है? और फिर हमने भी तो दुनिया को बाढ़, भूस्खलन और ट्रेफ़िक जाम की तमाम ख़बरों वाली दुनियां में तब्दील कर दिया है।
 
कई बार मुझे लगता है कि हर इंसान को बादल का एक छोटा टुकड़ा होना चाहिए था। लेकिन हम बूँद भर भी बचे नहीं रह सके। होना ये था कि एक दूसरे की आत्मीयता की ऊष्मा हमें आसमान तक ले जाती और एक दिन मिलकर हम ऐसा बादल बन जाते जो पूरी धरती को झुलसने से बचा लेता। लेकिन हुआ यूँ कि हममें इतनी सघनता भी न बची रह सकी कि हम ख़ुद को बिखरने से बचा पाते। मैं बादल न बन पाने के मलाल से आसमान को देखता हूँ। और मुझे बादलों से जलन होने लगती है जो आख़िर में कुढ़न में बदल जाती है। और बारिश जिसका आनंद लेना सबसे आसान था वो भी मुश्किल लगने लगा है।
 
बात इतनी सी है कि जीवन सरल था पर हमारे डर ने उसे मुश्किल मुश्किल बना दिया। वरना बारिश में भीग जाने का डर, बारिश में भीगने की ख़ुशी के सामने कहां टिकता भला? 
 
#बादबारिशके 

Comments

comments

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz