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चार छोटी कविताएं

सन्नाटे की मौत

तुम न कहो
मैं समझ न पांउं।
कुढ़ता रहूं हमेशा।
तुम भी रहो परेशान।
रहे सदा
अवान्छनीय मौन।
बेहतर है
मौत जैसे सन्नाटै से
सन्नाटे की मौत।
हम तुम तय कर लें
कब बोलना है
कहां चुप रहना है।

सदा 

सदा एक सदा आती है
सदा बहार है सदा
सदा डराती है।
और वो रहते हैं
सदा खौफजदा।
चुप रहने की आदत ने ऐसी मौत दी है
वो जी भर के मरते हैं सदा सर्वदा।

मंत्री जी का मैसेज 

दिल्ली में प्लेन का रनवे है
देहरादून में बसों के लिए हाईवे है
पिथौरागढ़ में डामर का बना चौड़ा वे है
गंगोलीहाट में एक संकरा वे है
और  हमारे गांव के लिए आज भी
मंत्री जी का मैसेज कनवे है
कि एक छोटा सा वे
साल दो साल में कभी चुनवा देंगे
शर्त इतनी सी है
कि हर साल की तरह इस बार भी
उन्हें मिनिस्टर बनवा देंगे।

आदतें

खामोश सा है अहसास
और एक कोना है कहीं दिल में
सिमटकर बैठना आता नही
हलचल पे है अंकुश
वो कहां है
जो आयेगा एक रोज
और कहेगा कि बदल लो आदतें
धत तुम तो पागल हो।

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