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घर में सर्दी के बीच हिमालय को देखते हुए

दूर हिमालय
शान्त खड़ा है
दरकती हुई परतों का शोर
अपनी षान्त नियति में छुपाया हुआ सा।

एक लहर जो बिना चीखे
समा रही है
असंख्य छातियों के भीतर
रुह में अभेद्य सिहरन दिये
जिसका नाम डर नहीं है।

जलती हुई अंगीठियों के भीतर
पक रहं, लाल नारंगी रंग
और उनपर कांपती सी नीली हवा
जो ठिठुरते हाथों में समा जायेगी
और शीत लहर
कुछ देर गाायब होने का स्वांग भर
लौट आयेगी थोड़ी देर में।

गर्म लपटें जिन्दगी की तरह
ठंडी सांसों को करेंगी
कुछ देर और जिंदादिल।
हिमालय देखता हुआ सा
दूर खड़ा
अपनी किसी फिल्म के लिए
जैसे कई फ्रेम तैयार कर रहा है।

अंगीठी का कोयला
न जाने कब बन जायेगा बर्फ की सीली
दूर हिमालय से आती वो शीत लहर
कर देगी शान्त कुछ आत्माओं को
हमेशा के लिए।
और लाल नारंगी आंच पर
वो नीली लपट
गायेगी जिन्दगी का आंखिरी गीत।

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1 Comment on "घर में सर्दी के बीच हिमालय को देखते हुए"

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निशाचर
Guest

सुन्दर रचना है एवं चित्र तो सुन्दर है ही……………