ताज़ा रेजगारी

गुलज़ार के लिये

कभी कभी जब पढ़ता हूं गुलज़ार तुम्हें

ग़ुल जैसे महकते लफ़ज़ों के मानी हो जाते हैं

और लफ़ज़ ज़हन के पोरों को गुलज़ार किये देते हैं

लगता है कि एक सजा सा गुलदस्ता

लाकरके किसी ने ताज़ा ताज़ा रख्खा हो

और विचारों की टहनी में भावों की कोमल पंखुड़ियां नाच रही हों

अक्ष्रर अक्षर मेरे ज़हन में रंग से भर जाते हैं 

फिर मैं भी तो गुलज़ार हुआ जाता हूं……..

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1 Comment on "गुलज़ार के लिये"

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डॉ॰ मोनिका शर्मा
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अक्ष्रर अक्षर मेरे ज़हन में रंग से भर जाते हैं
बहुत खूब….. गहन विचार