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गिर्दा के इर्द गिर्द

दिल लगाने में वक्त लगता है, डूब जाने में वक्त लगता है, वक्त जाने में कुछ नहीं लगता, वक्त आने में वक्त लगता है।
गिरीश तिवारी गिर्दा

वक्त जा चुका है। गिरदा नहीं रहे। अब ऐसा वक्त आने में समय लगेगा जब गिरदा जैसा कोई जनकवि, जनसेवक फिर पैदा होगा और हमसे झूमते हुए कह उठेगा ततुक नी लगा उदेख, घुनन मुनई न टेक। दिल्ली के राजेन्द्र भवन में गिरदा की दिवंगत आत्मा को सृद्धान्जली देने के लिये आज उमड़ी भीड़ इस बात की अभिव्यक्ति ही थी कि गिरदा महज उत्तराखंड वासियों के दिलों में ही नही बसते रहे थे बल्कि उनके लिये लोगों की चाहत का आकाश और भी विस्त्रित है। जन संस्कृति मंच द्वारा आयोजित इस सृद्धान्जली सभा की शुरुआत पत्रकार भाषा सिंह ने कार्यक्रम की जानकारी देते हुए की।
कार्यक्रम का संचालन करते हुए भूपेन सिंह ने कहा कि उत्तराख्ंाड आन्दोलन के दौर में गिरदा के गीतों के प्रति एक जुनून युवाओं में हुआ करता था। भले गिरदा को कभी देखा न हो पर उनके गीत जब होंठों को छूते तो लगता कि वो कोई हीरो हैं। गिरदा उनके लिये किताबों और किंवदंतियों की तरह हुआ करते। उन्होंने कहा कि गिरदा यथास्थिति के खिलाफ खड़ा होने वाला एक गहरा आशावाद थे जिसकी पैठ उनके जानने वालों और उनके सम्पर्क में आने वालों लोगों में भी देखी जा सकती थी।

समयान्तर पत्रिका के सम्पादक पंकज बिष्ट ने 1968 में गिरदा से हुई अपनी पहली मुलाकात को याद करते हुए कहा उन्होंने उत्तराखंड के घोर जातिवादी समाज में कास्ट को डीकास्ट करते हुए अपनी रचनात्मक उड़ान भरी। एक ओर उन्होंने गीत एवं नाटक प्रभाग में नौकरी की तो दूसरी ओर उत्तराखंड आन्दोलन के दौर में स्थानीय रहन-सहन और जनजीवन से कविताओं को जोड़कर आन्दोलन को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका अदा की।

गांधी शान्ति प्रतिष्ठान की राधा भट्ट ने बताया कि नदी बचाओ अभियान की शु्रुआत से लगभग 6 वर्ष पहले वो गिर्दा से मिली। उनके गीत इतने लोकप्रिय थे कि लक्ष्मी आश्रम में पढ़ने आने वाली लड़कियां भावविभोर होकर उन्हें गाती। गिर्दा जब आश्रम में आये तो उन्होंने जाना गिर्दा अन्य लोकगायकों की तरह धुन और लय के लिये नहीं बल्कि उनकी भावनाओं के लिये गाते थे। यह भावुक गायन ही था कि लोग इन गीतों से भावनात्मक जुड़ाव महसूस करने लगते। उनका गाया गीत जैंता एक दिन तो आलो…..कुमाउनी लोगों का वी शैल ओवरकम था। एक जनआन्दोलन बिना जनकवि के चल ही नहीं सकता और उनके आन्दोलनों और पदयात्राओं में गिरदा के गीत वो सब महज कुछ पंक्तियों में कह जाते जो एक लम्बे भाषण में भी नहीं कहा जा सकता। कोई भी प्रतिरोध शुष्क हृदय लेकर नहीं जन्म ले सकता उसके लिये एक भावपूर्ण हृदय चाहिये । गिर्दा जैसा हृदय।

तीसरी दुनिया के सम्पादक आनन्द स्वरुप वर्मा ने बताया कि गिर्दा के साथ वक्त बिताना एक आकर्षण की तरह था। उनके बिना नैनीताल की कल्पना भी करना बेमानी था। गिर्दा के जाने से जो शून्य सांस्कृतिक जगत में पैदा हुआ है उसे भरना असम्भव है। उनकी लिखी एक कविता से इस बात का अन्दाजा लगाया जा सकता है कि समकालीन गम्भीर मुददों के लिये उनकी समझ कितनी सहज थी
कैसा हो स्कूल हमारा
जहां न अक्षर कान उखाड़ें
जहां न भाषा जख्म उघाड़े।
गिर्दा की रचनात्मकता को किसी एक शाखा में नहीं बांटा जा सकता। उन्होंने फैज और साहिर का कुमाउनी में अनुवाद किया तो नगाड़े खामोश हैं, अंधायुग और अंधेर नगरी जैसे नाटकों को मंचन और निर्देशन भी किया।
गिर्दा के नजदीकी मित्र प्रो शेखर पाठक ने गिर्दा को भावुक मन और नम आंखों से याद करते हुए बताया कि किस तरह अपने अन्तिम तीन दिनों में बीमारी से जूझते दिखे गिर्दा। और आंखिर में विदा हो गये। उनकी शवयात्रा जैसे कोई ऐतिहासिक यात्रा हो। लोग अपनी रुंदली आवाज में ही सही उनके गीत गा रहे थे और परम्परा के विपरीत इस यात्रा में महिलाएं भी मौजूद थी। उस आदमी में ऐसा क्या था जो इतने लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर लेता था। भारत छोड़ो आन्दोलन के दौर में जन्मा गिर्दा एक फक्कड़ ग्रामीण गवैया था। अल्मोड़ा शहर में आने के बावजूद उसके भीतर का ग्रामीण नहीं मरा। वो जयजगदीशहरे के संस्कारों को लेकर पैदा तो हुआ पर जिया बेड़ृ पाको बार मासा की परम्परा के साथ। गिर्दा को गीतों की सीख मोहन सिंह रीठागाड़ी, केशव अनुरागी और गोपीदास सरीखे तत्कालीन लोकगायकों से मिली। गिर्दा एक बार घर से भागे पर ऐसी जगह जहां पहाड़ का कोई आदमी भागकर नहीं जाता। वो पीलीभीत गया और वहां अपनी जीविका के लिये उसने रिक्शा चलाया। वो कहता था कि रिक्शा चलाना हल चलाने जैसा ही तो हुआ। गिर्दा को जीवन भर एक रोग लगा रहा। सम्पत्ति न जोड़ने का रोग। उसकी आवश्यकताएं हमेशा न्यूनतम रही। एक कुर्ता पहना, झोला लटकाया और निकल पड़ा। कुछ समय पीडब्लुडी में नौकरी करने के बाद सन 67 में वो संगीत एवं नाटक प्रभाग से जुड़ा। उस दौर में उसने मोहिल माटी जैसे नाटकों का लालकिले में मंचन किया। विजेन्द्र लाल शाह, पंचानन पाठक, कर्नल गुप्ते और लेनिन पंत जैसे संस्कृतिकर्मियों का साथ उसे मिला। सन 77 के दौर तक गिर्दा के सांस्कृतिक जीवन का रुपान्तरण हो चुका था। वहीं से वो विकसित रंगकर्मी के रुप में उभरा और अब तक की पूरी संास्कृतिक प्रकृया में वो एक मिथक बन गया है। उसने नैनीताल की निर्ममता को इस तरह बदला कि पूरा नैनीताल सड़क पर आने को विवश हो गया। उसे केवल हिमालयी अंचल का मानना उसे छोटा करके देखना होगा। उसने अपनी बाहर की खिड़कियों को हमेशा खुला रखा। युगमंच, नैनीताल समाचार, उत्तरा जैसी कई शुरुआतें उनके बिना न हुई होती। गिर्दा एक छुपा हुआ पत्रकार भी था। भागीरथी में आई बाढ़ के दौर में उसका वो पत्रकार बाहर आया। बाबा नागार्जुन और उसके बीच एक फक्कड़ दोस्ती हुआ करती थी। वो दोनों एक बीड़ी को चूस चूस कर पीते। जहां एक ओर चंद्रीप्रसाद भट्ट, राधाबहन और शमशेर सिंह बिष्ट जैसे राजनैतिक कार्यकर्ता उसके मित्र थे तो वही दूसरी ओर नीरज और फैज जैसे साहित्यकारों से उसकी दोस्ती थी। झूसिया दमाई पर किया गया काम उसकी बहुगुणित रचनात्मकता का एक छोटा सा नमूना है। घोर अव्यवस्थित और अनियमित जीवनशैली के बीच भी अपने काम के लिये उसमें एक गजब का अनुशासन था। वो अपने आसपास के समाज को लेकर हमेशा चिन्तित रहा और ये चिन्ताएं मुख्यतह तीन बिन्दुओं पर केन्द्रित रही। उत्तराख्ंड बनने की प्रक्रिया की दृश्टिहीनता एवं लक्ष्यहीनता, वामपंथी एवं जनपक्षधर ताकतों में उभरा विखंडन और जनआन्दोलनों के साथियों के बीच पनपी संवादहीनता। किसी काम की शुरुआत के बाद स्वयं पृष्ठभूमि में चला जाना उसकी आदत थी। ऐसे में उसने समाज के बीच हमेशा खाद की तरह काम किया।

कवि मंगलेश डबराल ने गिर्दा पर बोलते हुए कहा कि उत्तराखंड से जुड़े किसी संघर्ष की कल्पना गिर्दा के बिना नहीं की जा सकती। नैनीताल जैसे सैलानियों के शहर में वो एक जीवंतता ले आये थे। वो एक बुनियादी स्वभाव के इन्सान थे। गिर्दा के दौर में विजेन्द्र शाह जैसे लोगों ने लोक को एक शक्ल दी तो गिर्दा ने उन्हें सामाजिक आन्दोलनों की ओर मोड़ने का जरुरी काम किया। उनके क्रान्तिकारी गीतों में एक गहरी प्रतिबद्धता थी जिसमें आशावाद कूट कूटकर भरा था।

इन वक्ताओं के अतिरिक्त चंद्री प्रसाद भटट, जनसंस्कृति मंच के आसुतोश, राजेन्द्र धस्माना आदि ने भी गिर्दा से जुड़ी अपनी यादें ताजा कर उन्हें सृद्धांजली दी। जनसंस्कृति मंच के रोहित प्रकाश ने प्रो वीएनराय के अभद्र आचरण के संदर्भ में एक प्रस्ताव पढ़ा। साथ ही आयोजन में गिर्दा के जीवन, और उनके सांस्कृतिक, सामाजिक योगदान से जुड़ी एक फिल्म भी दिखाई गई जिसका संकलन एवं संपादन रोहित जोशी और उमेश पंत ने किया। कार्यक्रम में दिलीप मंडल, अभिशेक स्रीवास्तव सहित कई पत्रकार एवं गिर्दा के चाहने वाले मौजूद थे।

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1 Comment on "गिर्दा के इर्द गिर्द"

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Deepak
Guest

his loss has come as a shock to an entire community which was invigorated by his seminally important contributions to discover ,sustain and promote the culture which today stands threatened! today we have lost yet another beacon of culture and civilization………….

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