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खोई हुई एक चीज़

कविता

कविता

यहीं कहीं तो रख्खी थी

दिल के पलंग पर
यादों के सिरहाने के नीचे  शायद
या फिर वक्त की
जंग लगी अलमारी के ऊपर

तनहाई की मेज पे या फिर
उदासियों की मुड़ी तुड़ी चादर के नीचे ?
यहीं कहीं तो रख्खी थी

कुछ तो रखकर भूल गया हूं
आंखिर क्या था
ये भी याद नहीं आता

कई दिनों से ढूंढ रहा हूं
वो बेनाम सी ,बेरंग
और बेशक्ल सी कोई चीज़

ऐसी चींजें खोकर वापस मिलती हैं क्या ?

एक-दूजे की ज़िंदगी में
हम दोनों भी ऐसी ही खोई हुई एक चीज़ हैं न ?

मैं फिर भी कोशिश करता हूं
तुम तो अब ढूंढना भी शायद भूल गई हो

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