ताज़ा रेजगारी

खुशी की आदत…

ये अंधेरा कभी तो
उस उजाले सा रहा होगा
तुम्हें जब कुछ नहीं दिखा
बहुत कुछ हो रहा होगा

बहुत थोड़ी सी बारिश
थोड़ी सी बूंदें
ज़मी पर अब भी बाकी हैं
वो भीगा पत्ता
शायद गर्द अपनी धो रहा होगा।

कड़ी गर्मी में
तुम्हारे घर पे अपना घर बनाते हैं
के जब बरसात आती है
कबूतर लौट जाते हैं
उन्हें मालूम है
कहीं कोई अंबर कुहासा खो रहा होगा

यहां जब रात की कालिक
मेरी आंखों में छाई थी
अमावस पास आया था
मुझे पूरा यकी हैं तब
कोई इक टूटता तारा
कहीं पर तो रहा होगा।

उम्मीदें सांस ले सकती हैं
कैसे भी अंधेरे में
वो एक लमहा गुजरता
दूसरे का बीज शायद बो रहा होगा……

खुशी जब आदतों में हो
तो फिर हर बार आती है
बुलाकर देख लो शायद चली आये
किसे मालूम उसको भी
तुम्हारा इन्तजार हो रहा होगा ।

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1 Comment on "खुशी की आदत…"

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thefemaleme
Guest

ख़ुशी को बुला कर देख लो, शायद नहीं ज़रूर आएगी :):) कभी कभी हम खुद ही हिचकिचा जातें हैं आवाज़ लगाने में…

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