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खाली जगह

लाखों, करोड़ों में से,  
 किसी एक के कम होने से
यूं तो फर्क नहीं पड़ना चाहिये
फिर भी पड़ता है फर्क….

कुछ जो कम होकर छोड़ जाता है ,
कहीं किसी कोने में खाली जगह…
जिसे न हवाएं भर सकती हैं, न यादें…..

सम्भावनाओं के कुछ बुलबुले रह जाते हैं उस जगह,
जो पैदा करते रहते हैं कई और बुलबुलों का भ्रम…..
जिनके बनने और टूट जाने के बीच 
वक्त के सिवा कुछ नहीं बदलता….

उस खाली जगह पर 
एक अदृश्य सी कसर रह जाती है बस
जो उतनी ही अर्थहीन होती है
जितना उस खाली जगह का भरा जाना
किसी दूसरे से……..

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