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क्यों वीरान हो गई पहाड़ की बाखलियां

पिछले कुछ सालों में प्रदेश की अर्थव्यवस्था में जिन क्षेत्रों का बोलबाला रहा उनमें कंस्ट्रक्शन, मैन्यूफैक्चरिंग और जलविद्युत ऊर्जा प्रमुख हैं। बीते दौर में कलकारखानों और खनन में 15 फीसदी की विकास दर देखी गई जबकि कृषि में यह विकास दर केवल 2 फीसदी की रही। ज़ाहिर है कृषि क्षेत्र के विकास में सरकार की रुचि खनन और कारखानों की तुलना में बहुत कम रही और इसकी वजहें किसी से छिपी नहीं है। पिछले दौर में नेताओं के पूंजीपति हो जाने का जो चलन प्रदेश में पनपा है ये वजहें उसी चलन में अन्तर्निहित हैं।

उत्तराखंड में मौजूद करीब 15,761 गांवों में से ज्यादातर गांवों में एक ट्रेंड जो लगातार देखा जा रहा है, वो है गांवों में अपनी ज़मीनें और घरबार लावारिस छोड़कर शहरों की तरफ पलायन। हल्द्वानी और देहरादून में पिछले कुछ सालों में ज़मीनों के दाम तेजी से बढ़े हैं और उसी तेजी से बढ़ी है ज़मीन की मांग। 2011 की जनगणना के मुताबिक गांवों में 69.7 फीसदी जनसंख्या रह गई है जबकि 2001 में ये जनसंख्या 74.8 फीसदी थी।

 एशियन जर्नल आॅफ रिसर्च इन साइंस एंड ह्यूमेनिटीज़ की एक रिपोर्ट की मानें तो नवम्बर 2000 में जब उत्तराखंड बना तो यहां के मैदानी और पहाड़ी इलाकों में रहने वाली जनसंख्या का अनुपात तकरीबन समान था लेकिन मौजूदा हालात ये हैं कि प्रदेश की 62 फीसदी जनसंख्या चार प्रमुख मैदानी जि़लों में रह रही है जबकि शेष 9 पर्वतीय जि़लों में महज 40 फीसदी जनसंख्या रह गई है। मैदानी इलाके हरिद्वार में जनसंख्या घनत्व 612 व्यक्ति प्रति वर्ग मीटर है जबकि उत्तरकाशी में यह जनसंख्या घनत्व महज 37 व्यक्ति प्रति वर्ग मीटर है। इस उदाहरण से समझा जा सकता है कि उत्तराखंड में गांवों से लोंगों का किस तरह मोह भंग हुआ है।

 इस दौर में प्रदेश से बाहर होने वाला पलायन भी तेजी से बढा़ है। प्रदेश से बाहर होने वाले पलायन की ये दर राष्ट्रीय औसत (11.5 फीसदी) से भी ज्यादा (16.1 फीसदी) है। पहाड़ के शहरी इलाकों में तकरीबन 9 फीसदी की दर से लोग पलायन कर रहे हैं जबकि ग्रामीण इलाकों में यह दर इससे कई ज्यादा यानि तकरीबन 19 फीसदी है।

क्यों बढ़ा पलायन

 लेकिन आखिर ऐसा क्यों हुआ कि खूबसूरत पहाड़ी गांवों से लोगों को भारी मात्रा में पलायन करके शहरों में जिन्दगी बसर करने को मजबूर होना पड़ा। पलायन की वजहों की पड़ताल करें तो पता चलता है कि यह दरअसल उत्तराखंड के विकास के मौडल की एक बड़ी चूक का परिणाम है। उत्तराखंड की सरकारों ने दावा तो किया कि वो अगले कुछ सालों में उत्तराखंड को हौर्टिकल्चर का हब बनाएंगी और इसकी तमाम सम्भावनाएं भी उत्तराखंड में बिखरी पड़ी हैं लेकिन सरकार ऐसा कर पाने में बुरी तरह विफल हुई है। मौजूदा वक्त में प्रदेश की केवल 13.5 फीसदी भूमि में कृषि कार्य होता है जबकि राष्ट्रीय औसत 43 फीसदी से भी ज्यादा है। प्रदेश के जिस इलाके में कृषि होती है उसमें पहाड़ी क्षेत्र अब भी हासिये पर है। प्रदेश में सिंचाई क्षेत्र का 86 फीसदी मैदानी इलाके में आता है जबकि पहाड़ी क्षेत्र में महज 14 फीसदी। तमाम दावों के बावजूद ये स्पष्ठतौर पर देखा जा सकता है कि नीति निर्माताओं का ध्यान पहाड़ों में खेती को बढ़ावा देने में कभी रहा ही नहीं। नेश्नल सेम्पल सर्वे आॅर्गनाइजेशन के 2003-2004 से 2007-2008 के बीच आये आंकणों की तुलना करें तो उत्तराखंड के ग्रामीण इलाकों में भूमिहीन किसानों की संख्या 21 फीसदी से 37 फीसदी हो गई है।

 पिछले कुछ सालों में प्रदेश की अर्थव्यवस्था में जिन क्षेत्रों का बोलबाला रहा उनमें कंस्ट्रक्शन, मैन्यूफैक्चरिंग और जलविद्युत ऊर्जा प्रमुख हैं। बीते दौर में कलकारखानों और खनन में 15 फीसदी की विकास दर देखी गई जबकि कृषि में यह विकास दर केवल 2 फीसदी की रही। ज़ाहिर है कृषि क्षेत्र के विकास में सरकार की रुचि खनन और कारखानों की तुलना में बहुत कम रही और इसकी वजहें किसी से छिपी नहीं है। पिछले दौर में नेताओं के पूंजीपति हो जाने का जो चलन प्रदेश में पनपा है ये वजहें उसी चलन में अन्तर्निहित हैं।

 प्रदेश में खेती के अलावा जिस क्षेत्र में विकास की अपार संभावनाएं थी वो है पर्यटन। लेकिन बीते दौर में आई सरकार की नीतियां देखते हुए लगता है कि यह क्षेत्र भी तिरस्कृत ही रहा है। भारत सरकार की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2008 से 2009 के बीच देशभर में पर्यटकों की आवाजाही में तकरीबन 16 फीसदी का इजाफा हुआ जबकि उत्तराखंड में यह दर 7 फीसदी भी नहीं रही।

दोषपूर्ण विकास माॅडल

 उत्तराखंड में लागू किये गये विकास के माॅडल की एक बड़ी खामी ये भी है कि प्रदेश में जो विकास हो भी रहा है वो मैदानी इलाकों में केन्द्रित है। प्रदेश के ग्रामीण इलाके का सकल घरेलू उत्पाद में महज 35 फीसदी का योगदान है। विकास के इस भेदभावपूर्ण और केन्द्रीकृत माॅडल का परिणाम ये हुआ है कि हल्द्वानी और देहरादून जैसे मैदानी इलाकों में निजी क्षेत्र ने अपना धावा बोल दिया। क्योंकि औद्योगिक विकास के नाम पर निजी क्षेत्र को तमाम किस्म की छूट सरकार ने मुहैया की हैं। इनमें सब्सिडी, सस्ती दरों के लोन, सस्ती लीज़ पर ज़मीनें और करों में भारी छूट शामिल है। जबकि सार्वजनिक क्षेत्र की गुणवत्ता लगातार कम होती रही। उदाहरण के तौर पर देखें तो प्रदेशभर में तमाम सरकारी काॅलेज होने के बावजूद हल्द्वानी और देहरादून उच्च शिक्षा के हब बने हुए हैं। प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के नाम पर सरकारी स्कूलों की संख्या में तो भारी इजाफा हुआ है लेकिन ग्रामीण अंचल के स्कूलों की पड़ताल करें तो पाएंगे कि वो स्कूल केवल नामभर के हैं। वहां न शिक्षक हैं न ही गुणवत्तापूर्ण शिक्षा।

 वहीं तमाम जि़ला चिकित्सालयों के बावजूद स्वास्थ्य सुविधाओं के लिय प्रदेश ज्यादातर जनसंख्या देहरादून और हल्द्वानी के निजी अस्पतालों पर निर्भर है। सरकार की उदासीनता का आलम ये है कि बीते कुछ सालों में प्रदेश में स्वास्थ्य सुविधाओं की भारी कमी के बावजूद प्रदेश और जि़ला स्तर के लिये आवंटित बजट का तकरीबन 35 फीसदी खर्च ही नहीं हो रहा।

 उत्तराखंड के पड़ौसी राज्य हिमांचल प्रदेश में तकरीबन समान भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद पलायन की दर बहुत कम रही है। यह भी देखा गया है कि वहां पर्यटन और बागवानी के क्षेत्र में उल्लेखनीय काम हुआ है। उत्तराखंड को अपने पड़ौसी राज्य से सीख लेकर इन क्षेत्रों में खास ध्यान देने की ज़रुरत है वरना यहां के पर्वतीय अंचल से जिस गति से पलायन हो रहा है उसे देख यह भी सम्भव है कि यहां के गांवों में उजड़ी बाखलियों और बंजर खेतों के अलावा कुछ शेष ही न रह जाये।

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