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कोपेनहेगन के बहाने

जलवायु परिवर्तन के मुददे पर बहुत कुछ लिखा जा रहा है आजकल। बहुत सी बहसें। बहुत से जुलूस। बहुत से कोंन्फ्रेस, सेमीनार, किताबें और न जाने क्या क्या। पर असल में किया क्या जा रहा है कम से कम ऐसे बड़े श्हरों में जहां बहसें अपने इन्टलैक्चुअल रिदम के साथ उफान पर हैं, यह जरा देखने वाली बात है। दिखे तो कोई बता दे।

इस ब्लाग को लिखने की एक खास वजह है। जो इस वैश्विक मुददे को स्थानीय होकर देखने से पैदा हुई है। इस पूरे मुददे को पहले चरण में पूरी तरह वैश्विक और दूसरे चरण में पूरी तरह स्थानीय होकर देखेंगे तो हमें सैद्वान्तिक और व्यावहारिक दोंनों के बीच का अन्तर नजर आयेगा। कैसे सैद्वान्तिक प्रयास कोपेनहेगन की शक्ल में हर जगह चर्चा में है और व्यावहारिक प्रयास किसी दूसरी शक्ल में लुप्तप्राय दम तोड़ने की कगार पर। तो आईये इस मुददे पर ग्लोबल टू लोकल जाकर बात की जाये।

पहला यानि सैद्वान्तिक पक्ष

कोपेनहैगन इन दिनों खूब चर्चाओं में है। यूएनएफसीसी और बाली कन्वेंशन का जारी रह पाना और क्योटो प्रोटोकाल में की गई घोषणाओं का पालन करना शंका के घेरे में है कि क्या विकसित देष ऐसा करेंगे। यहां इस बार कोपेनहेगन में अब मुख्य समस्या यही है कि क्या जलवायु परिवर्तन को लेकर कोई कानूनी दस्तावेज तैयार होगा जिसपर विकसित और विकासशील देश दोनों राजी होंगे या फिर विकसित देश अपनी जिद पर बने रहेंगे कि जलवायु परिवर्तन को लेकर सारे मसौदे केवल राजनैतिक घोषणाओं तक ही सीमित रहेंगे। उन्हें कानूनी जामा नहीं पहनाया जा सकेगा। विकसित देशों की इस हेकड़ी की वजह साफ है। क्योटो प्रोटोकौल के तहत निर्णय लिया गया था कि 2008 से 20012 के बीच सभी देश ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कम से कम 5 प्रतिशत की कमी करेंगे। लेकिन विकसित देश ऐसा करने में असफल साबित हो रहे हैं। ऐसे में विकासशील देशों को उनपर हावी होने का मौका मिल रहा है। इन देशों ने 2007 में हुए बाली सम्मेलन में अमेरिका, ब्रिटेन आदि देशों को लताड़ा भी था। भारत की ओर से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी इन्द्रागांधी की तर्ज पर कह आये थे कि जब विकसित देश अपने उत्सर्जन में कमी करने का तैयार नही हैं तो भारत भी अपने विकास को ताक पर रखकर उत्सर्जन में कमी नहीं करेगा।

उन्होंने जोर दिया था कि यदि जलवायु परिवर्तन पर बात हो रही है तो देश की गरीबी पर भी बात होनी चाहिये। भारत जैसे देशों में ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन का अनुपात अमेरिका, ब्रिटेन आदि से बहुत कम है। क्योटा सम्मेलन के दौरान ही कार्बन क्रेडिट की अवधारणा ने जन्म लिया। इसके तहत ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन की एक सीमा निर्धारित की जाएगी । हर देश की सरकार तय करेगी कि उत्सर्जन की ये सीमा क्या होगी। इस निर्धारित सीमा से ज्यादा उत्सर्जन करने की अनुमति उस देश का नहीं होगी। और यदि उसे ज्यादा उत्सर्जन करना होगा तो उसे किसी दूसरे देश से कार्बन क्रेडिट खरीदने होंगे। यह दूसरा देश वह देश होगा जिसने अपनी निर्धारित सीमा से कम उत्सर्जन किया होगा। इस पूरे व्यापार को कार्बन टेडिंग का नाम दिया गया है और बाकायदा इसके लिए अन्तर्राश्टीय बैंक बनाये गये हैं। कार्बन टेडिंग का भारत जैसे देशों को बड़ा फायदा हो सकता है। क्योंकि हमारे पास एक विस्तृत वन प्रदेश है। और जंगल ग्रीनहाउस गैसों की मुख्य गैस कार्वन डाई आक्साईड को अवशोषित करते हैं। ऐसे में जंगलों को बढ़ावा देना जलवायुपरिवर्तन के बुरे प्रभावों को रोकने के लिए जरुरी है। और कार्बन क्रेडिट की अवधारण आने के बाद आर्थिक रुप से फायदेमंद भी।

अब देखें दूसरा यानि व्यावहारिक पक्ष।



जलवायु परिवर्तन की ये पूरी अवधारणा वैज्ञानिक अवधारण है और इसका होना इस विज्ञान के अंधानुकरण का नतीजा। तो क्या कहीं विज्ञान को ज्यादा मानना तो इस परिवर्तन की वजह नहीं है। अगर ऐसा ही है तो क्या इसे रोकने के लिए अंधविश्वास का सहारा लिया जा सकता है। उत्तराखंड के पहाडों में कुछ इसी तरह का अंधविश्वास है जो है अपनी अवधारणा में तो अवैज्ञानिक है पर उसके असर वैज्ञानिक रुप से फायदेमंद। पहाडों में अपने जंगलों को देवी को चढ़ाने की प्रथा है। यहां के पहाड़ी इलाकों का एक बड़ा हिस्सा लोगों ने अपने ईष्ट देवी देवताओं को चढ़ा दिया। मान्यता ये है कि एक बार देवी को चढ़ा देने के बाद इस जंगल से कोई भी पत्ता तक नहीं तोड़ सकता। अगर कोईे ऐसा करता है या जंगल को किसी तरह का नुकसान पहुंचाता है तो देवी देवता उसका कोई ना कोई अनिष्ट जरुर कर देंगे। पहाड़ी गांवों में इस बारे में लोगों से पूछिये तो वो आपको कई किस्से सुना देंगे कि एक बार फलां ने जंगल को नुकसान पहुंचाया तो उसके घर में फलां की मौत हो गई। लोगों का इस बात पर प्रबल विश्वास है। ये अंधविश्वास ही सही पर इस मान्यता ने पहाड़ों के कई जंगल उजड़ने से बचा लिये। कई उजड़े हुए जंगलों को फिर से आबाद कर दिया। उनकी ये आस्था भले अवैज्ञानिक हो पर इसके परिणाम उस दौर में बड़े वैज्ञानिक साबित हो रहे हैं जब जंगलों या प्रकृति को नुकसान पहुंचाने का दुश्प्रभाव कोपेनहेगन, क्योटो या बाली जैसी वैश्विक बहसें करने को मजबूर कर रहा है। लेकिन गांव वालों के ये भोले से अवैज्ञानिक प्रयास आज के दौर में सराहे जाने चाहिये। ऐसे ग्रामीणों को बढ़ावा दिया जाना चाहिये जो जाने अनजाने इतनी विकराल बन रही चिन्ताओं को कम किये दे रहे हैं। इसी ब्लाग में पहले दामोदर राठौर के प्रयासों का जिक्र किया गया था कि कैसे अकेले अपने बूते उन्होंने उजड़ चुके जंगल को आबाद कर दिया। बुढ़ापे की दहलीज पर पहुंचे उस आदमी के जीवट प्रयासों का जिक्र शायद ही कहीं हुआ हो। ऐसे कई प्रयास देश के छोटे छोटे कोनों में होते होंगे और दम तोड़ देते होगे। अब जबकि कार्बन उत्सर्जन में कमी कार्बन क्रेडिट जैसी अवधारणाओं के चलते आर्थिक रुप से भी फायदा दे सकती है। ऐसे में न केवल इन लोगों को बढ़ावा दिया जाना चाहिये बल्कि उन्हें इस आर्थिक लाभ में भागीदारी भी मिलनी चाहिये ताकि उनकी गरीबी को भी दूर किया जा सके। अगर मनमोहन सिंह बाली जाकर गरीबी का हवाला देते हुए उत्सर्जन में कमी न करने की हेकड़ी दे सकते हैं, जो कि नाजायज नहीं है, तो वो अपने ही देश में उत्सर्जन में कमी ला रहे अदृश्य सहयोगियों की गरीबी के लिए भी कुछ कर सकते हैं।

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3 Comments on "कोपेनहेगन के बहाने"

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bhai ji ap ka climet change pe likhi gayi ek ek line mene kafi dhayan se padi hai n i loved it not jst bcz of our frndship it realy nic fect ke sath aap ne jis tarha se apni bat rakhiu hai usse aap ne apni bat badi safai se keh di hai n aap ka msg i think convy ho gaya hai

उमेश पंत
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but aapne anonymous bankar comment kiya hai..kripya apna parichay bhi de den.

GANWAARGURU
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BANDHU, AAPNE SAHI KAHA.AGAR EK ANDHVISHWAS DUNIYA BACHA SAKTA HAI TO WO SARKAR KE KAGJI PRAYASO SE JYADA ACHCHHA HAI. HAAN CARBON CREDIT KA LABH AISE HI AREA KE LOGO KO MILE, ISKA BHAROSA KAUN DILAYEGA?

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