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किसके लिए लड़ रहे हैं अन्ना हजारे….

जन लोकपाल विधेयक पर अंग्रेजी में बहुत सी पाठ्यसामागी इन्टरनेट पर मौजूद है। हिन्दी में ना के बराबर जानकारी है। इसलिये ये लेख हिन्दी पाठकों के लिये जो मेरी ही तरह इस बिल के बारे में ज्यादा जानना चाहते हैं
 
 
सुना कि अन्ना हजारे अनशन पे बैठे हुए हैं। लगा कि समझना चाहिये कि आंखिर मुद्दा क्या है। और जब समझा तो लगा कि दरअसल ये मुद्दा तो हमारे अपने जीवन से जुड़ा है। लोकपाल विधेयक एक ऐसा विधेयक जो सन 68 में पहली बार संसद के सदन में लाया गया और तबसे अब तक हमारे राजनेताओं की निरंकुशता का शिकार होता रहा। अगली बार अगली बार करते करते पूरे आठ बार उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। और ऐसा करने की एकमात्र वजह यही थी कि ये विधेयक राजनेताओं की भ्रष्ट मानसिकता पर सवाल उठाने की जेहमत कर रहा था। ये विधेयक कह रहा था कि प्रधानमंत्री सहित सारे मंत्री संत्री इसकी जद में आयेंगे और अगर उनके खिलाफ शिकायत हो तो उनपर जांच बैठाई जाएगी और दोशी पाये जाने पर उनके खिलाफ कानूनी कार्यवाई भी की जाएगी। लेकिन वो लोग भला इस बात को कैसे मान लेते जो नेता ही इसी बिसात पे बनते हैं कि ऐसा करके वो अपनी और अपने आने वाली पुश्तों का आर्थिक उद्धार कर सकेंगे। और ऐसा कोई भी उद्धार बिना घोटालों के सम्भव नहीं होता। ऐसे में जब भी बिल राज्यसभा और लोकसभा में लाया जाता तो ये कह कर उसे खारिज कर दिया जाता कि अभी इसमें सुधार की जरुरत है।  
 
   गांधी जी इस बात को पहले ही समझ चुके थे कि जनता के सेवकों की करतूतों पर कार्रवाई करने के लिये ऐसे किसी नियंत्रक की जरुरत है जिसके पास यथोचित अधिकार हों। जो जनता के सिवाय और किसी के लिए जवाब देह ना हो। अपने बड़े सकारात्मक उदगार में उन्होंने कहा था कि भ्रष्टाचार एक दिन दूर जरुर होगा भले ही इसे छुपाने की कितनी ही कोशिशें कर ली जायें। और जनता अपने कर्तव्य एवं अधिकार के तहत अपनी न्यायसंगत शंकाओं के लिये अपने सेवकों यानि नेताओं पर कड़े फैसले ले सकती है, उन्हें बर्खास्त कर सकती है, उन्हें कठघरे में खड़ा कर सकती है या फिर उनके व्यवहार की जांच करने के लिये किसी प्रशासक को नियुक्त कर सकती है। ये बात महात्मा गांधी ने 1928 में कही और इसके 40 साल बाद संसद में ऐसे ही किसी विधेयक की सुगबुगाहट हुई। लेकिन 2जी स्कैम और कौमनवैल्थ घोटाले से लेकर चारा घोटाला, बोफोर्स घोटाला, सत्यम घोटाला से होते हुए घोटालों की फेहरिस्त इतनी लम्बी होती चली गई कि अपने गिरेबान में झांकना तो दूर उस ओर नजर उठाकर देखना तक हमारे राजनेताओं को बहुत महंगा लगने लगा। ऐसे में खुद वो एक ऐसे विधेयक को मंजूरी दे दें जो उनकी इन काली करतूतों पर प्रश्न करता हो ये खुद के लिये कब्र खोदने जैसा काम था। जाहिर तौर पर अपनी कब्रें खोदना किसे अच्छा लगता है। 
 
लेकिन अब जब फिर से इस विधेयक को लाने की बात हो रही है तो उसके मसौदे में कुछ अंदरुनी खामियां बुद्धिजीवियों को नजर आ रही हैं। मसलन ये कि लोकपाल तीन लोगों की एक समिति होगी जिसका चेयरमैन सुप्रीम कोर्ट का रिटायर्ड मुख्यन्यायाधीश होगा और उसके साथ दो और न्यायाधीश रह चुके लोग इस समिति के सदस्य होंगे। लेकिन जिस तरह से हालिया खुद एक मुख्य न्यायाधीश के जी बालकृश्णन भ्रष्टाचार के आरोपी पाये गये उससे इस बात पर सवाल खड़े हो गये कि क्या लोकपाल के पद पर ऐसे लागों का आसीन होना इस पद को पारदर्शी बनाये रख पाएगा? अगर इन्डिया अगेंस्ट करप्सन की साईट पर जाकर इस मसौदे की आलोचना देखें तो साफ लगता है कि इस बिल का मौजूदा ड्राफट बिल्कुल कमज़ोर और प्रभावहीन है। अव्वल तो ये कि इन तीन लोगों को चुनने वाली जो चयन समिति होगी उसमें ज्यादातर लोक सत्ता में बैठे लोग होंगे। उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, दोनों सदनों के नेता, दानों सदनों में विपक्ष के नेता, कानून मंत्री और गृहमंत्री इस चयन समिति में होंगे। माने ये कि उपराष्ट्रपति के अलावा सारे सदस्य राजनेता ही होंगे। दूसरा ये कि प्रधानमंत्री के खिलाफ कोई भी कार्यवाई सदन के सदस्यों द्वारा तय की जाएगी। वो सदन जिसमें बहुमत उसी प्रधानमंत्री के दल का होगा। तीसरा ये कि लोकपाल खुद किसी आरोपी के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर सकते वो सम्बधित संस्था को कार्रवाई के लिये आदेशित भर कर सकते हैं। चौंथा ये कि आम जनता कोई शिकायत दर्ज नहीं करा सकती। पांचवा ये कि जो व्यक्ति शिकायत दर्ज करायेगा उसकी शिकायत झूठी होने पर उसे कड़े दंड के प्रावधान हैं और ये दंड खुद लोकपाल तय करेंगे जबकि यदि आरोप सही निकलते हैं तो आरोपी के खिलाफ दंड तय करने का अधिकार लोकपाल को नहीं होगा। छटा ये कि लोकपाल खुद से यानि सुओ मोटो किसी पर कोई एक्शन नहीं ले सकता। सातवां ये कि लोकपाल केवल एमपी, मिनिस्टर या फिर प्रधानमंत्री के खिलाफ ही जांच करवा सकते हैं किसी अधिकारी के खिलाफ नहीं। आठवां ये कि प्रधानमंत्री के खिलाफ यदि कोई विदेश, रक्षा या सुरक्षा से जुड़े मामले पर आरोप हैं तो लोकपाल उनपर जंाच नहीं करवा सकता और ये भी कि लोकपाल महज एक सलाकार समिति होगी उसको खुद किसी कार्रवाई को शुरु करने के अधिकार नहीं होंगे। इस तरह अगर मौजूदा मसौदे को देखें तो उसमें कोई दम ही नज़र नहीं आता।
 
   ऐसे में जनलोकपाल बिल का जो मसौदा प्रशान्त भूषण, किरण बेदी, जेएम लिंगदोह, शान्तिभूषण, अरविन्द केजरीवाल जैसे लोगों ने तैयार किया है वो मौजूदा बिल को जनता के हित में और प्रभावशाली बनाने की एक अच्छी पहल लगती है। इस ड्रªाफट में लोकपाल की चयनसमिति में नोबेल और मैग्सेसे पुरस्कार प्राप्त भारतीय मूल के लोगों, भारत रत्न से सम्मानित लोगों, मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक, उच्च और सर्वोच्च न्यायालय के दो दो सीनियर मोस्ट न्यायाधीशों और दोनांे सदनों के सभापतियों को शामिल करने की बाद की गई है जिससे ये चयनसमिति एक बेहद सन्तुलित समिति लगती है। इस समिति की चयनप्रक्रिया को भी पारदर्शी बनाये जाने का उल्लेख इस ड्राफट में है साथ ही आम आदमी को शिकायत दर्ज कराने का हक मुहैय्या कराने की बात भी ये ड्राफट करता है। सरकार द्वारा प्रस्तावित विधेयक की तुलना में ये संशाधित विधेयक कहीं ज्यादा प्रभावशाली मालूम होता है। 
 
     अन्ना हजारे के नेतृत्व में पूरे देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ जो मुहिम खड़ी हो रही है उससे कुंद होते जनान्दोलनों को एक बार फिर धार मिली है। लेकिन एक तबका है जो इस आधार पर अन्ना हजारे को समर्थन देने से इनकार कर रहा है कि वो कौर्पोरेट्स और विपक्षी राजनैतिक दल के एजेंडे को सेट करने का काम कर रहे हैं। ऐसे लोगों के सामने यही तर्क रखा जा सकता है जो देश वर्ड कप जीतने पर तिरंगा उठाकर समझ रहा था कि उसका कर्त्तव्य पूरा हो गया उसका कुछ अंश ही सही आज भ्रष्टाचार के खिलाफ तिरंगा उठा रहा है तो इसके पीछे उस बूढे आदमी का कुछ तो योगदान है ही। और वो योगदान आज दिल्ली, मुंम्बई और देश के अलग अलग कोनों की सड़कों पर दिखाई दे रहा है जिसे नकारा नहीं जा सकता। यहां हम किसी व्यक्ति को समर्थन दें या ना दें लेकिन जो मुद्दा इस आंदोलन में उठाया जा रहा है वो एक ऐसा मुद्दा है जिससे आम आदमी का जीवन जुड़ा है। इस आन्दोलन को समर्थन देना कहीं न कहीं उस जीवन को समर्थन देने जैसा ही है। 


(कुछ महत्वपूर्ण लिंक जो इस मुददे को समझने में मदद करेंगे)


http://www.scribd.com/doc/21632406/Lok-Pal-Bill-An-Analysis


http://indiaagainstcorruption.org/

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