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किनके नयनों को प्यारी है नैनो

नैनो अब सड़कों पर होगी और कई बे कार लोगों के दिमाग में चुहल पैदा करेगी कि काश अब बहुत हो गया। इस कार के आने के बाद कई पहलुओं पर चर्च ए आम है। इस ब्लौग के लिए रोहित ने ये आलेख आ भेजा हैं साभार छाप रहा हूंरोहित जोशी

एक लम्बे इन्तजार के बाद टाटा ‘नैनो’ बाजार में उतर आई है। जुलाई माह से ‘नैनो’ सड़कों में भागती-दौड़ती दिखाई देने लगेंगी। सम्पूर्ण मीडिया जगत् ने भी ‘नैनों’ पर बिठाकर इसका स्वागत किया है। ‘लखटकिया’ नाम से मशहूर टाटा की यह कार दुनियां की सबसे सस्ती कार है। इस कारण यह तब से ही चर्चा में रही है, जबसे टाटा ग्रुप के मालिक रतन टाटा ने कोलकाता में ‘टाटा टी’ के एक कार्यक्रम एक लाख रूपये में कार निकालने की घोशण की थी। ‘नैनो’ को निकाले जाने की घोशणा के बाद से ही ‘रतन टाटा’ की गरीबों के प्रति दो तरह की संवेदनाऐं देखने को मिली हैं। पहली, जैसा कि षुरू से ही मीडिया बताता आया है, रतन टाटा अपनी लक्ज़री गाड़ी से सड़क पर दुपहिया में भीगते गुजरते पूरे परिवार को देखकर द्रवित हो उठते हैं और इस तबके के लिए सस्ती कार का बन्दोबस्त करते हुए मार्केट में लखटकिया ‘नैनो‘ पेश कर देते हैं। वहीं दूसरी ओर इस कार के निर्माण के लिए सेज के तहत पश्चिम बंगाल के सिंगूर में टाटा वहां के गरीब किसानों के विरोध प्रदर्शनों के बावजूद उनकी खेती की जमीन हथिया वहां उघोग लगाने के लिए भी तैयार दिखते हैं। वो तो मामले के अत्यधिक विवाद में फंस जाने से तमाम तामझाम लेकर उन्हैं पश्चिम बंगाल छोड़ गुजरात जाना पड़ा। तो ‘टाटा’ की गरीबों के प्रति यह दो तरह की संवेदना हैं।
‘टाटा’, ‘नैनो‘ उतारने के लिए भारत ही नहीं अपितु सम्पूर्ण विश्व के लिए चर्चित रहे हैं। लेकिन मीडिया ने जिस तरह सिर्फ दुपहिये में परिवार जाते देख टाटा के द्रवित होने को ही लखटकिया निकालने के स्रोत के रूप में प्रचारित किया है यह सीधे-सीधे गले नहीं उतरता। टाटा की संवेदनाओं से ऊपर बाजार की मांग बड़ा मसला है। अन्यथा सिंगूर के किसानों के विरोध प्रदर्शनों पर हिुए लाठी चार्ज व नंदीग्राम में हुआ नरसंहार भी टाटा को संवेदित करता। पर यहां उन गरीब किसानों की चिन्ता छोड़ टाटा ने पष्चिम बंगाल सरकार से सेज के तहत मिलने वाली सब्सिडी का खयाल करना ज्यादा उचित समझा था। आखिर उन्हंें मिली सब्सिडी तो नैनो को सस्ता बनाने की उनकी मुहीम में मददगार षाबित हो सकती थी पर किसानों के प्रति उनकी संवेदनाऐं महंगी ही पड़ती। लेकिन यहीं दूसरी ओर दुपहिए में भीगते हुए परिवार को देखकर टाटा द्वारा जाहिर की गयी संवेदनाऐं उनकी लखटकिया ‘नैनो’ के प्रचार व बिक्री की दृश्टि से बड़ा फायदा पहुंचाऐंगी इसलिए ये संवेदनाऐं मीडिया के सामने फूट पड़ती हैं।
भारत में विगत् दशक में निम्न मध्यम वर्ग की आर्थिक स्थितियों में दुपहिया इतना सटीक बैठा है कि मोटरबाइक कम्पनियों ने बड़ा मुनाफा कमाया है प्रत्येक वर्श भारत में तकरीबन 80 लाख दुपहिये बिक रहे हैं जिनमें तकरीबन 72 लाख दुपहियों का बाजार केवल प्रमुख तीन कम्पनियों हीरोहोण्डा, बजाज और टीवीएस के नाम है। जिसके चलते ये कम्पनियां क्रिकेट टूर्नामेंटों सरीखे बड़े आयोजनों में स्पोंसर बन पा रही हैं। दूसरी और भारत का कार बाजार लगभग ठहराव की से चलते हुए 13 लाख कारें प्रतिवर्श ही बेच पा रहा है। और इसका भी 60 प्रतिशत हिस्सा छोटी कारों (मारूती 800, आॅल्टो, जेन,वेगनआर,इण्डिका,जैसी कम कीमत की कारों) के पास है। कारों की बिक्री में दुपहियों ने जाम लगाया हुआ है। ऐसे में कार कम्पनियों को अपनी बिक्री बढ़ाने के लिए दुपहियों का विकल्प रखने की आवष्यकता है। भारत में एक बड़ा मध्यम वर्ग है। और कार बाजार इस मध्यम वर्ग को अपनी 3 से 5 लाख की कीमत की कारों से पाटता हुआ अब भारत के निम्न मध्यम वर्ग की ओर बड़ रहा है। इसकी ही षुरूवात टाटा ने ‘नैनो‘ से की है। टाटा के साथ ही साथ मारूती, हुण्डई, होण्डा, फोर्ड, फोक्सवैगन, रिनोल्ट, बजाज, निषान, अषोक लेइण्ड, वोल्वो, आइसर, एम एण्ड एम, आदि कम्पनियां एक दूसरे को निवेष में सहयोग देकर छोटी कारें निकाल रही हैं। ऐसा नहीं है कि इन कम्पनियों के मालिकों को साथ ही दुपहिए में भीगते परिवार के लोग दिख हों और सभी लाख रूपये में कार उतार कर इन भीगते परिवारों को आसरा दे पुण्य कमाने की फिराक में हों बल्कि ये सब मुनाफे के बीजगणित का कमाल है।
एक साप्ताहिक मैग्जी़न की सर्वे रिपोर्ट के आकड़ों के अनुसार आॅटोमोबाइल कम्पनियां अपने 7डालर (280रू) के निवेश पर तकरीबन 100 डालर (4000रू) कमाती आई हैं। लेकिन अब कम कीमत पर कारें उतार कर ये कम्पनियां अपने मुनाफे में थोड़ा कमी कर ग्राहकों की भीड़ से ज्यादा मुनाफा कमाना चाहती हैं। भारत में अपनी कार होने का सपना सजोने वाला निम्न मध्यम वर्ग ‘नैनो‘ जैसी कारों के बाजार में आने से अपने सपनों के सच होते जाने से प्रसन्न है। भारत में तकरीबन 30 करोड़ का निम्न मध्यम वर्ग तो लखटकिया खरीद सकने की क्षमता रखता ही है और टाटा ने तो अभी सिर्फ 1 लाख नैनो कारें ही बाजार में उतारी हैं। यानि नैनो के बाजार में उतरने से पहले ही बिक जाने की गारंटी है। ये बात यूं ही देखने में आती है कि लाॅर्टी द्वारा ग्राहकों को छांटना पड़ रहा है। इसे देख और कम्पनियां भी इस मुनाफे के सौदे को टाटा का अकेले ही कमा लेना नहीं देख सकती और इन्होंने भी अपनी अपनी सस्ती कारों की घोशणाऐं कर डाली हैं। दुपहियों पर गहराते सस्ती कारों के इस नऐ संकट को भारतीय दुपहिया बाजार में तकरीबन 35प्रतिशत की हिस्सेदार बजाज आॅटो ने भी महसूस किया है। इसी के चलते बजाज ने निषान व रिनोल्ट के साथ मिल अगले चार वर्शों में सस्ती कार बाजार में उतारने की बात कही है। कुल मिलाकर टाटा ने इसकी पहल की और अपनी संवेदनाओं को बाजार में भुनाने की कोशिश भी।
‘टाटा’ द्वारा ‘नैनो’ को निकाले जाने से भारत ही नहीं अपितु पूरे विश्व में बतौर आॅटो मोबाइल कम्पनी ‘टाटा’ की साख बढ़ी है। यह कम्पनी के दृश्टिकोण से उसके लिए बहुत बड़े फाइदे की बात है। जनवरी 2008 में ‘नैनो’ के माडल के लाॅंचिंग के कुछ ही हफ्तों बाद टाटा ने भारतीय बाजार में दुनिया की नामी गिरामी कम्पनी ‘फोर्ड’ की मार्केटिंग भी मिल गई थी। विषेशज्ञ इसे ‘नैनो’ द्वारा बढ़ी कम्पनी की साख के प्रभाव के रूप में ही देखते हैं।
यहां कुछ अटकलें नैनो के पहले लौट के बाद उसकी कीमतों को लेकर बरकरार हैं। पहले लौट में तो नैनो के बेसिक माॅडल की कीमत 1 लाख रूपये ही रखी गई है। दिल्ली में आॅन रोड कार की यह कीमत 1 लाख 32 हजार तक पहुंचेगी। साथ ही ए0 सी0 व अन्य सुविधाओं के साथ एल0 एक्स0 माडल के नाम से नैनो आॅन रोड 1 लाख 72 हजार में उतरेगी। लेकिन संभावना जताई जा रही है कि टाटा नैनो का अगला लौट कुछ महंगा हो सकता है। इसके पीछे टाटा को पष्चिम बंगाल में हुआ नुकसान और वैश्विक स्तर पर छाई मन्दी को प्रमुख कारण के रूप में देखा जा रहा है।
अब इतना तो तय है कि भारत की तंग हाल सड़कों में लखटकियांओं की भीड़ जरूर बड़ने वाली है। साथ ही पर्यावरण व पैट्रोल पर भी पड़ने वाला लखटकियांओ का बोझ कुछ महत्वपूर्ण सवाल खड़े करता है। बी0बी0सी0 को एक साक्षातकार देते हुए पर्यावरण के प्रति लम्बे समय से आन्दोलित, पर्यावरणविद् अनुमिता राॅय चैधरी का कहना था कि,‘हम ‘नैनो’ के खिलाफ नहीं हैं। हम खिलाफ हैं निजि वाहनों के। नीजि वाहनों में बढ़ोत्तरी से पर्यावरण पर पड़ रहे इस तरह से बेतहासा दबाव पर आने वाले समय में हम कुछ नहीं कर पाऐंगे। हमें अभी तैयारी करनी होगी।’ यूं तो ‘टाटा’ कम्पनी के मुताबिक ‘नैनो’ प्रदूशण की दृश्टि से भी ‘नैनो’ ही है। लेकिन इसकी भीड़ कितना प्रदूशण फैलाऐगी यह अभी एक सवाल ही है और फिर कई अन्य कम्पनियां भी अभी लखटकिया निकालने की फिराक में हैं ही।

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4 Comments on "किनके नयनों को प्यारी है नैनो"

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Shefali Pande
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pant ji…petrol bhi ismen tata hi dalvaenge

Shefali Pande
Guest

pant ji…petrol bhi ismen tata hi dalvaenge

मुनीश ( munish )
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Dear Umesh, TaTa is a businessman ,not Gautam buddh . obviously, he is out there to make money . whats new about him in ur analysis? u are young , still a student so u should go outdoors exploring some hill station instead of indulging in that which is already known to everybody.Regards. Munish

rohit joshi
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i am to much late to write the answer of MUNISH ji’s comment……but after all…..मुनीष जी नमस्कार! उमेष भाई के ब्लाॅग ‘नई सोच’ पर किए गए आपके आर्टिकल कमेन्ट का पीछा करते करते आपके ‘मयखान’े में पहुंच पाया हूॅं। दरअस्ल आप जो कमेन्ट उमेष भाई के नामे छोड़ आए थे आपको यह बताना था कि उसका असली हकदार मैं हूं। हमारे देष के महान टाटा और उनकी महान नैनो पर कुछ लिख देने की गुस्ताखी मैंने ही की थी। ये मेरा दुर्भाग्य रहा कि आपने आलेख सरसरी निगाह में पड़ा और बतौर सम्पादकीय उमेष भाई की टिप्पणी पढ़ना आप भूल… Read more »