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कितना जायज़ है मौत का मज़ाक

इस बीच फेसबुक पर दो मसलों को लेकर प्रतिक्रियाओं का अनवरत दौर जारी है। बाला साहब ठाकरे का देहावसान और अजमल कसाब को गुपचुप दी कई फांसी। इन दोनों ही विषयों में यूं तो तुलना करने के लिये कुछ भी समानता नहीं है पर इन पर आ रही प्रतिक्रियाओं में जो एक बात कौमन है वो है इन पर की जा रही बेहद असंवेदनशील टिप्पणियां।
फेसबुक पर इन मौतों को लेकर तमाम तरह के मज़ाक किये जा रहे हैं। लोगों ने यहां तक लिखा है कि बाला साहब ठाकरे का साथ देने के लिये कसाब को यमराज ने अपने पास बुला लिया। इन टिप्पणियों का स्तर बेहद सतही और एक हद तक फूहड़ है।
ये बात समझने की है कि फेसबुक इस दौर में संचार के एक महत्वपूर्ण माध्यम के तौर पर उभर रहा है। इस माध्यम को भले ही संचार का जिम्ेमदार और गम्भीर माध्यम न माना जाता हो पर इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि इसकी पहुंच का स्तर अब बहुत व्यापक हो चला है। इसीलिये इस पर की गई कोई भी टिप्पणी प्रत्यक्ष रुप से ना सही पर अप्रत्यक्ष रुप से विचारों में बहुत कम ही सही पर असर ज़रुर छोड़ती है।
 मास मीडिया की एक थेरी है- बुलेट थेरी। इस थेरी का सार यही है कि लोगों पर आप जिस तरह की सूचनाओं की जितनी अधिक बौछार करेंगे लोगों के माईन्डसेट में उसी तरह से बदलाव होता रहेगा। इस बदलाव की गति भले ही बहुत धीमी हो लेकिन कहीं न कहीं आपको दी गई किसी भी तरह की सूचना आपके सबकौन्सियश में कोई न कोई असर डालती ज़रुर है।
मौत चाहे किसी की भी हो वो खुशनुमा तो कतई नहीं हो सकती। उस पर अटटहास करना असभ्यता की ही निशानी है। युवा साहित्यकार गौरव सोलंकी की टिप्पणी इस संदर्भ में बहुत सार्थक मालूम होती है। वो कहते आप जो मौत पर चुटकुले गढ़ सकते हैं, मुझे आपसे बहुत डर लगता है। वाकई मौत पर चुटकुले गढ़े जाने की ये परंम्परा एक बेहद गैरजिम्मेदाराना और असंवेदनशीन आभासी समाज की नीव डाले जाने की प्रक्रिया का अंग है। एक ऐसा समाज जिसके लिये कुछ भी कह देना बहुत आसान है पर उसका दूरगामी असर क्या हो सकता इसकी कल्पना तक करना बहुत मुश्किल।
पुलिसिया महकमों ने इस बीच जिस अलोकतांत्रिक तरीके से फेसबुक पर सरकार या फिर सरकारी महकमे में प्रभाव रखने वाले लोगों के खिलाफ फेसबुक पर टिप्पणी करने वाले लोगों को गिरफत में लेने की कोशिश की है उससे ये बात साफ हो जाती है कि वो भी इन माध्यमों पर की जाने वाली टिप्पणियों के दूरगामी असर से अच्छी तरह वाकिफ हैं। इस बाबत भले ही सरकार या पुलिस को आम आदमी की अभिव्क्ति की स्वतंत्रता का हनन करने का कोई नैतिक अधिकार ना हो, पर टिप्पणी करने वाले लोगों को भी एक नैतिक आत्म नियंत्रण की ज़रुरत से इनकार नहीं करना चाहिये।
हम अपनी टिप्पणियों में जिस तरह की हिंसक और अभद्र किस्म की भाषा का प्रयोग करने लगे हैं, उसे बढ़ावा दिया जाना उस सामाजिक तानेबाने के लिये खराब है जिसमें अब भी मौत जैसी दुखद घटनाओं के लिये संवेदनाएं जि़ंदा है।
सोशियल नेटवर्किग वैबसाईटस में अपनी त्वरित प्रतिक्रियाऐं पोस्ट कर देने की इन आदतों के चलते इस दौर में हम जिस बात को सिरे से खारिज कर रहे हैं वो ये है कि हमारे समाज को बुरे इन्सानों से जितना खतरा है उससे कई गुना ज्यादा खतरा बुरी सोच से है। केवल उस इन्सान के चले जाने से उसकी सोच भी खत्म हो जाये, ये ज़रुरी नहीं है। उस सोच को खत्म करना समाज के नागरिक होने के नाते हमारी नैतिक जिम्मेदारी है। लेकिन जब हम उस व्यक्ति की मौत का उत्सव मनाने लगते हैं तो हम कहीं न कहीं उसी हत्यारी मानसिकता का अंग बन जाते हैं जो अजमल कसाब जैसे लोगों को बम धमाके करके कई मासूम जानें निगल लेने के लिये उकसाती है।
हमारा राष्टीय मीडिया भी इन विषयों की कवरेज करते हुए इतने आक्रामक तरीके से पेश आता है कि लगता है कि किसी की मौत मीडिया के लिये टीआरपी बटोरने के एक साधन से ज्यादा कुछ भी नहीं है। दर्शकों को शायद ये समझाने की ज़रुरत है कि कसाब जैसे लोगों को दी गई फांसी दरअसल उस हिमाकत को दी गई फांसी है जो अपने आतंकवादी इरादों के चलते दहशत फैलाकर सामाजिक शान्ति को भंग करना चाहती है। न कि एक व्यक्ति मात्र को दी गई फांसी जो कि किसी देश का नागरिक या किसी मां का बेटा है।
किसी की मौत पर टीका टिप्पणी करते हुए हमारी संवेदनाओं का मर जाना कहां तक जायज़ है, कोई भी टिप्पणी करने से पहले हमें इस बारे में एक बार ज़रुर सोचना चाहिये।

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