ताज़ा रेजगारी

कल

मैं भी था और तुम भी थी और वो निर्जन सी चुप्पी भी
अच्छा होता गर वो खामोशी हमसे कुछ कहती तो

यह सन्नाटा भी चुप होने की हद तक गहरा होता
अगर तेरी आवाज हवा सी आस पास ना बहती तो

तेरा कुछ ना कहना भी शायद मुझको अच्छा लगता
तेरी आंखों में कुछ कहने की मंषा गर रहती तो।
                                                      
प्यार अनूठे पागलपन की एक निशानी बन जाता
हम दोनों के बीच भरोसे की दीवार न ढहती तो।

ना जाने नजदीकी का भ्रम कब तक मैं पाले रहता
दूरी के जख्मों से रिसता दर्द ये आखें सहती तो।

सहने की हद क्या होती है मैं तुझकोे बतला देता
पलकों के पोरों के नीचे जलधारा ना बहती तो।

काश कि तुम पहले तुम बता देती तुमको जाना होगा
कभी तुम्हारे पास न आता एक बार तुम कहती तो।

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