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ओसियान का दूसरा दिन


ओसियान फिल्म फेस्टिवल के दूसरे दिन आज तीन फिल्में देखी। तेजा, मैन वूमेन एंड अदर स्टोरीज और ब्लाईंड पिग हू वान्टस टू फलाई। पहली फिल्म तेजा हेला जर्मिया के निर्देशन में बनी है। फिल्म अफ्रिका के इन्टलेक्चुअल युवाओं के पलायन पर केन्द्रित है। फिल्म मुख्य रुप से अपने अतीत पर अधिकार के हक के समर्थन में खड़ी होती है। अफ्रिकी समाज की एक बहुत कड़वी सच्चाई को दिखाती इस फिल्म के कुछ अंशों में दर्शकों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। एक अफ्रिकी डोक्टर एन्बर्बर जो अपने देश, समाज और अपने व्यवसाय के लि आर्दर्शवादी होने की हद तक ईमानदार है, परिस्थिमिवश कैसे लाचार हो जाता है। अपने सामने अपने समाज के लोगों के साथ वो सरकारी अत्याचार को देखता है बावजूद इसके अपंगता की वजह से कुछ कर नहीं पाता। अपनी युवावस्था में अपने आदर्शों के फिए मर मिट जाने का माददा रखने वाला यह इन्सान सरकारी मनमानी का विरोध करने के चलते पहले अपने दोस्त को और फिर अपनी एक टांग गंवा देता है। उसे अपने गांव लौटना पड़ता है। वहां सरकार गांव के युवा और नौजवान लड़कों को देश के लिए लड़ने के नाम पर जबरदस्ती उनके घरों से निर्दयता से उठा ले जाती है। जो नहीं मानता उसे मौत के घाट उतार दिया जाता है। एन्बर्बर के अन्दर आग है, इस सबका विरोध करने की प्रबल इच्छा है। पर मजबूरी है कि वो कुछ कर नहीं सकता। कुछ चाहे भी तो उसकी मां उसे कुछ करने नहीं देती। क्योंकि इसका नतीजा वह देख चुकी है। मौत के मुंह से लौटे अपने बेटे को वो खोना नहीं चाहती। एनबर्बर को अपने युवा अतीत की घटनाएं, अपने साथ हुए निर्मम अत्याचार की यादें बार बार किसी दस्वप्न सी सताती हैं। इन यादों को फिल्माते हुए फिल्म के दृय हिला कर रख देते हैं। सब मिलाकर जर्मन और युथोपिया मूल की इस फिल्म की सिनेमेटोग्राफी भी कमाल है। सिंक के टैप से टपकती पानी की बूंदों की आवाज से एनबर्बर के आन्तरिक डर को दिखाने जैसी काबिलीयत फिल्म को बेहतरीन बना देती है।
आज की दूसरी बेहतरीन फिल्म जिसे केवल सिनेमेटोग्रेफी के लिहाज से भी देखने वाला देख सकता है वो है फिल्म इन्स्टिटयूट के छात्र रहे अमित दत्ता की फिल्म आदमी की औरत और अन्य कहानियां। अमित इससे क्रमशह और क्षत्रज्ञ भी बना चुके हैं। पर इस फिल्म की सिनेमेटोगेफी लाजवाब है। इस फिल्म को एबस्टेक्ट की श्रेणी में रखा जा सकता है। अगर आपने विनोद कुमार शुक्ल की कहानियां पढ़ी हों और उन्हें समझने में आपको मजा आता हो तो फिल्म में आपको मजा आयेगा। अमित की इस फिल्म को कल्ट फिल्मों में माना जाता है। विनोद कुमार शुक्ल की कहानियां किसी विश्य के इतने भीतर तक चली जाती हैं कि उन्हें समझने के लिए एक अजीब तरह के धैर्य की जरुरत होती है। उनमें अजीब तरह का ठहराव होता है। चूंकि फिल्म उन्हीं की कुछ कहानियों का रुपान्तरण है ता जाहिराना तौर पर यही ठहराव फिल्म में भी मौजूद है। लेकिन यह ठहराव बोर करने की हद तक नहीं पहुंचता क्योंकि फिल्म के हर दृश्य को फिल्माने में अमित ने मेहनत की है। हर फ्रेम अपने में एक अलग पेन्टिंग सा महसूस होता है। ज्यादातर षाटस नेचुरल लाईटिंग में हैं लेकिन इस लाईटिंग का कमाल प्रयोग फिल्म में किया गया है। डिस्टोर्टेड सा पर्सपेक्टिव देते कैमरा एंगल्स फिल्म में प्रयोग किये गये हैं। अक्सर टौप एंगल और लो एंगल से कैमरा खेलता है। फिल्म में महज तीन या चार पात्र हैं। छोटी छोटी तीन कहानियां फिल्म के अन्दर चलती हैं। तीनों कहानियां अपने में बिल्कुल अलग हैं। कहानी के पात्र बहुत नाटकीय हैं। फिल्म को देखते हुए एक फियेटर देखने सा एहसास होता है। उपर उपर देखने वालों को फिल्म बोर लग सकती है लेकिन फिल्म के दृश्यों से एक जुड़ाव हो जाने के बाद पूरी यह अपने बेहद स्थिर से प्रवाह में भी डुबा देने की क्षमता रखती है।
दोनों फिल्में देखने के बाद तीसरी फिल्म ने निराश किया। इन्डोनेशियन फिल्म ब्लाईन्ड पिग हू वान्टस टू फलाई बेहद थकी सी फिल्म लगी। इतनी की इसे पूरा देखने का मन नहीं हुआ। रात के 10 बज चुके थे तो समय ज्यादा होने का बहाना फिल्म अधूरी छोड़कर वापस आने के लिए काफी था।
खैर अनुराग कश्यप् और अभय देओल के साथ उनकी फिल्म देवडी पर चर्चा का सत्र भी ठीक ही रहा। अनुराग की कुछ बातें अच्छी लगी तो याद रही। एक तो ये कि अपने निर्देशकीय तकनीक को बताते हुए उन्होंने कहा कि कई बार वो अपने कलाकारों को बस सिचुएशन दे देते हैं और उक्ट करने को कह देते हैं। फिर इसी इम्प्रोवाईजेशन के दौरान वो कैमरा आन करके शाट लेना शुरु कर देते हैं। कलाकरों को पता तक नहीं होता कि उनमें से कौन इस वक्त कैमरे पर है। और शौट पूरा हो जाता है। इसके अलावा आज देवडी, ब्रदर्स और एनिमल टाउन जैसी कुछ अच्छी फिल्में भी आज दिखाई गई। एमसीआरसी जामिया ने फिल्में देखने की निषुल्क व्यवस्था कर दी तो फिल्मों का स्वाद और बढ़ गया। अगर आप कुछ अच्छी फिल्में देखना चाहते हैं तो कल वैसे अब आज सुबह साढ़े नौ बजे से डेरा डाल दें सिरी फोर्ड आडिटोरियम में। लेकिन ध्यान रखें कि अपने खाना पीना काफी मेहंगा मिल रहा है और महंगाई के बावजूद भी जो मिल रहा है मेरे कुछ दोस्तों का आरोप है कि वो बासी है। लेकिन खाने पीने का सामान आप अन्दर नहीं ले जा सकते। तो घर से खाकर आयें और बीच में चाय समौसे का मन हो तो पास ही में एक ठेला है। चाय अच्दी है, समौसे गरम। ढूंढ़ लीजिएगा।

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1 Comment on "ओसियान का दूसरा दिन"

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सागर
Guest

बहुत बहुत शुक्रिया… बेहतरीन जानकारी… ऑफिस पास में ही है… पर कमबख्त… आ नहीं सकता… आप देखिये… एक मेंबर वैसे हैं हमारे वहां…