ताज़ा रेजगारी

एक मुठ्ठी फुर्सत

मशरूफियत की जेबों में
सुबह सुबह यू ही तलाशी ली.
टटोला तो निकल आई कुछ पुरानी चींजें
कुछ भीगे कागज उम्मीदों के
कुछ रूखे छिलके सुकून के
एक मुड़ा हुआ विजिटिंग कार्ड खुशी का
(जिससे कभी मिलना ना हुआ)
पुरानी डायरी के पन्ने पे लिखी ख्वाहिशों की एक फेहरिश्त
( जिसकी स्याही पूरी तरह धुल चुकी थी अब)
निकालकर फेंक दिया इन चीज़ों को
वक्त के पास रखे उस कूडेदान में.
पर अब भी कुछ था जो बचा रह गया था.

बरसों पहले यूँ ही एक दिन बेवजह टहलते हुए
उस दोने के साथ मूंगफली वाले ने
ज़रा सी फुर्सत मुफ्त में दी थी
बाकी सब बेकार और बासी सा हो गया है अब
वो एक मुठ्ठी फुर्सत अब भी ताज़ी सी लगती है

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1 Comment on "एक मुठ्ठी फुर्सत"

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राकेश कौशिक
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“एक मुठ्ठी फुर्सत” – क्या बात है
और भी बहुत खुछ है “मशरूफियत की जेबों में”

शुभ आशीष – नव वर्ष 2013 की हार्दिक शुभकामनाएं