ताज़ा रेजगारी

एक बियाबान-सा जंगल है

अहसासों की वो पगडंडी
मुझे तुम तक ले आई
पर मैं जब तुम्हारे पास पहुँचा
तो जाने क्यों लगा
मैं रास्ता भूल आया हूँ।

तुम्हारी आंखों में
मैंने खुद को पाया
अपरिचित सा
और मुझे खुद से आने लगी
परायेपन की बू।

तुम चुराती रही नजरें
और भावनाओं के जखीरे से
खाली होती रही खुशियां।
तुम किसी जौहरी सी
तौलने लगी मुझे
अपनेपन की कसौटी में
चेहरे पर एक रुखा सा भाव लिए
कि मैं लुटा-पिटा सा
यहाँ क्यों चला आया हूँ।

तुम्हारी आँखें
किसी जादूगर के सम्मोहन सी
मुझे खींच तो लाई
पगडंडी के उस पार
और भावात्तुर-सा मैं
मिटाता रहा अपने पैरों के निशान
ताकि चाहकर भी
वापस ना आ सकूँ
तुम्हारे आशियाने से।

लेकिन आज इतनी नजदीक से
जब देखा है तुम्हारी आंखों में
खुद को अजनबी की तरह
एक टूट चुके मुसाफिर-सा
मैं लौट जाना चाहता हूँ।
पर अब न वापसी का रास्ता है
न पैरों में इतनी ताक़त
और न उम्मीद है आसरे की।

एक बियाबान-सा जंगल है
तुम हो, और तुम्हारे इर्द गिर्द
प्रेत सा परायापन।
अपनत्व की उम्मीद के
जल जाने का धुआँ
गहराता जा रहा है दावानल सा
और इन आंखों से झरती
भावनाओं का गीलापन
न जलने देता है आग को
न बुझ पाती है आग।

साँसों के भीतर
रिसता जा रहा है
रोआंसेपन का धुआँ
और जगा रहा है एक टीस
कि तुम मेरी कभी थी ही नहीं
कि तुम तक तय किया ये सफर
एक भुलावा था
और वो पगडंडी
महज एक मायाजाल।

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