ताज़ा रेजगारी

एक ज्यादती है कपिल साहब का बयान


15 जुलाई 2009 को कपिल सिब्बल ने लोकसभा में अपने भाषण में कहा था कि शिक्षा व्यवस्था में सभी तरह के नये प्रयोगों को शामिल किया जायेगा। और हाल ही में उन्होंने बयान जारी किया आआईटी में प्रवेश के लिए 80-85 प्रतिशत अंक लाना अनिवार्य होना चाहिये। 15 जुलाई को दिये हुए वक्तव्य में उनका मन्तव्य शायद इसी तरह के प्रयोगों से था। उनका मानना है कि जो बारहवीं में इतने अंक नहीं ला सकता उसे इतने प्रतिश्ठित संस्थान में प्रवेश नहीं मिलना चाहिये। सेंट स्टीफेंस और फिर हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की उच्च स्तरीय तालीम लिये कपिल सााहब का ये बयान जायज हो सकता है यदि उसे उस संसाधन परिपूर्ण समाज के संदर्भ में देखा जाये जहां डीपीएस, डानबास्को सरीखे एलीट शिक्षण संस्थानों की कोई कमी नहीं है। जहां छात्र छात्राओं के पास इतने संसाधन हैं कि वो महीने के हजारों अपनी स्कूल फीस, टयूटर आदि पर खर्च कर आसानी से 90 95 प्रतिशत अंक ले आयें। जहां एक एक बच्चे पर व्यक्तिगत रुप से घ्यान देने वाले टीचर बच्चे को नर्सरी से ही इतना पोलिस कर दें कि उनके लिए अंक लाना कोई बहुत बड़ी पहेली ना बनी रहे। कपिल साहब इस दायरे तक सही हो भी सकते हैं। लेकिन सिब्बल साहब जब अपने इस बयान को भारत जैसे देश के हर हिस्से पर लागू करने की बात करते हैं तो यह उनकी नासमझी नजर आने लगती है। सम्भवतह वो जानते होंगे कि वो ऐसे देश के मानव संसाधन विकास मंत्री हैं जहां किसी दूर दराज बीहड़ इलाके के गांव का ऐ बच्चा खस्ता हाल प्राईमरी स्कूल से पढ़ाई कर रहा है। वो अपनी ओर से पूरी मेहनत करता भी है पर उसके अशिक्षित मां बाप न उसकी पढ़ाई के स्तर पर मदद करने में सक्षम हैं, न उसके पास उसकी किताबों या टयूटर के लिए पैसे हैं। और एक या दो टीचर पूरे स्कूल को पढ़ाने की जिम्मेदारी लिये दिन काट अपनी सेलरी लेने की कवायद में जुटे हैं। ऐसे में अगर कोई कहता है कि वो छात्र इतना माददा ही नहीं रखता कि उसे आईआईटी में प्रवेश मिले तो इस बात को सार्वभौमिक सत्य कहना समझदारी तो कतई नहीं हो सकती। हमारे देश में ऐसे पिछड़े इलाके बहुतायत में हैं जहां एक दात्र की दिली तमन्ना होती है कि वो आआईटी जैसे संस्थानों से पढ़कर अपना भविष्य संवारे लेकिन जरुरी संसाधनों के अभाव में वह ऐसा कम ही कर पाता है। लेकिन कुछ विरले छात्र जो इन अभावों के बावजूद, बारहवी में कम अंक लाकर ही सही, आआईटी में प्रवेश पा जाते हैं कपिल साहब चाहते हैं कि उनसे ये हक भी छीन लिया जाये।
उत्तर प्रदेश, बिहार या उत्तराखंड सरीखे प्रादेशिक बोर्ड परीक्षाओं में 80 प्रतिशत का आंकड़ा पार करने वाले छाात्रों की संख्या बहुत कम होती है। इसके पीछे उपरोक्त कारणों की महती भूमिका होती है। यदि सिब्बल साहब की मन की बात हो जाती है तो इन प्रादेशिक पीक्षाओं में 60-70 प्रतिशत अंक पाने वाले छात्र जिन्हें प्रतिभाशाली माना जाता है आआईटी की प्रतियोगिता से बाहर हो जायेंगे। यहां हमारे बारहवी के पाठयक्रम पर भी ध्यान दिये जाने की जरुरत है। क्या यह पाठयक्रम इतना प्रायोगिक और विश्लेषणात्मक है कि इसे तकनीकी रुप से प्रतिभाशाली होने का मापदंड मान लिया जाये। दूसरा यह कि क्या हमारी मूल्यांकन व्यवस्था इतनी अच्छी है कि वहां किसी गड़बड़ी की कोई गुंजाईश ही नहीं है। जबकि बोर्ड परीक्षा परिणामों की छिछली सच्चाई यह भी है कि कुछ टीचर शराब पीकर या फिर पैसे ले देकर अंक दे देते हैं। पर यह हमारी शिक्षा व्यवस्था की तल्ख सच्चाई जरुर हैं। कपिल साहब की बात में वजन तभी आ सकता है जब हमारी शिक्षा व्यवस्था को समान रुप से देशव्यापी स्तर पर सुधारा जाये और कहीं कोई कमी ना रहे, जैसा कि कपिल साहब भी मानेंगे कम से कम हाल फिलहाल सम्भव नहीं है। हमारे पाठयक्रमों का सामान्यीकरण किया जाये और हर छात्र को समान संसाधन उपलब्ध कराये जांयें। ऐसा हो जाने के बाद सिब्बल साहब की बात को हमारी लोकतांत्रिक व्यव्स्था में माना जा सकता है वरना उनका बयान घोर अलोकतांत्रिक और देश के एक बड़े छात्र समुदाय के साथ ज्यादती है।

Comments

comments

Leave a Reply

1 Comment on "एक ज्यादती है कपिल साहब का बयान"

Notify of
avatar
Sort by:   newest | oldest | most voted
निशाचर
Guest
बारहवीं के गुणांक जोड़ने में कोई बुराई नहीं है परन्तु इसे इतना ज्यादा महत्व भी नहीं दिया जाना चाहिए कि स्कूली शिक्षा में भी भ्रष्टाचार और ज्यादा नंबर दिलवाने का खेल चालू हो जाये और प्रतिभा पीछे रह जाये. IIT की प्रवेश परीक्षा इतनी आसान नहीं होती कि कोई राह चलता उसे पास कर ले. हाँ इसकी तैय्यारी करने वाले किशोर गणित, भौतिकी और रसायन के अलावा अन्य विषयों पर उतना ध्यान नहीं देते जिसके लिए कोई अन्य उपाय खोजा जाना चाहिए परन्तु यह कहना कि केवल ८०-८५ प्रतिशत पाने वाले छात्र ही IIT में प्रवेश पा सकेंगे ज्यादती है.… Read more »
wpDiscuz