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एक चुटकुला हंसी की कमी से मर गया

ये भीड़ से भरा शहर यूं अकेला कर गया
एक चुटकुला हंसी की कमी से मर गया

यहीं रहता था, मसखरा था एक
कल से मिलता नहीं, जाने किधर गया

तुमने देखा हो तो बता दो ना
वो शायद मेरी खुशी लेकर गया

सबके चेहरे क्यूं यहां बेरौनक हैं
कौन बेनूर सबको यूं कर गया

वो जिसे सब ढूंढने में हैं मसरूफ
वो कहीं है ही नहीं कोई बताकर गया

कपड़ों के सिवा कुछ नहीं बदला कबसे
सुबह उठा, नहाया, और दफ्तर गया

मैं शहर आया, रहा, आखिर में
देखकर बेरुखी इसकी मैं बहुत डर गया

यूं भी मैं और किसी काम का न था
खुश रहने का भी अब मेरा हुनर गया

इतनी भीड़ है यहां कि किसे क्या मालूम
मैं हूं भी कहीं या कि मैं गुजर गया

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