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एक औरत के मन तक ले जाती फिल्म

Film : A woman under influence

कितनी फिल्में होंगी जो स्त्रियों के मनोविज्ञान में बहुत गहरे तक झांकने की कोशिश करती हैं। फिल्म जगत में ऐसी फिल्मों की स्थिति माइनोरिटी की तरह ही होगी। जाॅन कैसेवेटस (John cassavetes) की फिल्म अ वुमन अन्डर इन्फलुएंस ऐसी ही फिल्मों में है जो रिश्ते, परिवार, अपने व्यवहार और यहां तक कि अपने वजूद के प्रति एक स्त्री की असुरक्षा, भय और इस वजह से पनपी मनोवैज्ञानिक अस्थिता को मानव स्वभाव की तहों तक जाकर समझने की कोशिश करती है।

मेबल नाम की एक अधेड़ महिला के इर्द गिर्द घूमने वाली इस फिल्म को देखना एक स्त्री के मनोभावों की दुनियां में नंगे पांव घूम आने सा अनुभव है। वो दुनियां जिसकी धरती कहीं पावों को गुदगुदाती है, कहीं चुभती है, कहीं खंरोंचती है और कहीं भावनाओं की धार से चीर कर रख देती है। आप लहूलुहान होकर उस दुनियां से लौटते है, एक ऐसी टीस के साथ जिसे आप आमतौर पर आधी आबादी की उस दुनियां में चारों ओर बिखरा हुआ देख सकते हैं। ये फिल्म उसी टीस को समेटने की एक कोशिश करती नज़र आती है।

एक कंस्ट्रक्शन साइट में काम करने वाले मजदूर निक और उसकी पत्नी मेबल की शादीशुदा जि़न्दगी में ये एक तकलीफ भरा पड़ाव है। कई अनकही सी वजहें हैं जिनसे परिवार के बीच एक अन्तर्कलह का माहौल है। ये कलह निक के अपनी पत्नी को समय न दे पाने से उपजा है या निक के अपनी पत्नी के अन्य पुरुषों के प्रति खुले से लगने वाले व्यहार की वजह से या फिर मेबल की उस मानसिक स्थिति की वजह से जो सामान्य नज़रों से देखने पर सामान्य सी नहीं लगती। मेबल मनोवैज्ञानिक तौर पर एक समस्याग्रस्त महिला लगती है। उसके व्यवहार को सरसरे तौर पर देखने पर वह एक मनोरोगी नज़र आती है। लेकिन उसके भीतर चल रही उथल-पुथल को देखकर और उस उथल-पुथल से उसके व्यक्त्वि में आये बदलावों को देखकर दोषी कोई और नज़र आता है।

मेबल बार बार ये सवाल करती है कि क्या वो सही व्यवहार नहीं कर रही ? वो निक से बार बार ये पूछती है कि क्या वो उससे प्यार करता है ? वो बार-बार अपने तीन बच्चों के जीवन में अपनी अहमियत को परखती है। बार बार उसका मन एक असुरक्षा के भाव से गुजरता हुआ और कमज़ोर होता चला जाता है। अपने पति को खो देने का डर, अपने बच्चों से दूर चले जाने का डर और इस सब के बीच एक औरत के रुप में अपने अस्तित्व को न बचा पाने का डर।

मेबल एक ऐसी औरत है जो उन्मुक्त होना चाहती है। पर उसने अपनी ही उन्मुक्कताओं को जैसे दायरे में कैद कर लिया है। मसलन फिल्म के एक दृश्य में अकेलेपन से जूझ रही मेबल एक बार में जाती है और वहां उसे एक आदमी मिलता है जो उसके साथ उसके फ्लैट तक आता है। फ्लैट में आते ही वो उसके साथ यौन व्यवहार करना चाहता है लेकिन मेबल उसे रोक देती है। अपने पति से असंतुष्ट होने के बावजूद कुछ है जो उसे रोक देता है। वो उसके मध्वर्गीय मूल्य हैं या वो अपने पति से सचमुच इतना प्यार करती है कि उस प्यार को बांट ही नहीं सकती या फिर वो इतनी मजबूत ही नहीं है कि वो अपनी इच्छाओं और रिश्तों दोनों को अलग-अलग जगह पर रखकर उनसे जुड़ी अपनी समस्याओं को सुलझा सके। वो कन्फयूज़ है। ये कन्फयूजन इस हद तक उसपर हावी है कि वो धीरे-धीरे सनक में बदल चुका है। सनक जो धीरे-धीरे उसे एक मनोरोगी साबित करने पर तुली है।

कई बार मेबल ओवर पजेसिव हो जाती है। फिल्म के एक दृश्य में सुबह-सुबह वो बच्चों को स्कूल भेजने की जल्दी में दिखाई देती है क्योंकि उसे निक के साथ अकेले में वक्त बिताना है। लेकिन कुछ देर बाद वो अपने बच्चों के स्कूल जाने से बेचैन दिखती है। छुटटी के वक्त से बहुत पहले उस जगह पर चली जाती है जहां स्कूल बस उन्हें छोड़कर जाती है। नंगे पांव सड़क पर वो अपने बच्चों का बेसब्री से इन्तज़ार कर रही है। लोगों से बार बार समय पूछ रही है। और जब बस आती है तो वो बस की ओर लगभग लपककर अपने बच्चों से मिलती है, उन्हें गले से लगा लेती है।

फिल्म दरअसल एक वर्किग क्लास मध्यवर्गीय परिवार में महिला और पुरुष के बीच सम्बन्धों को बहुत गहरे से देखती है। एक पुरुष जो पैसा कमाने के लिये तकरीबन अमानवीय सी व्यवस्था में खपने को अभिशप्त है। जिसके पास अपनी पत्नी और अपने बच्चों के लिये वक्त नहीं है। जो अपनी पत्नी को वक्त नहीं दे पाता लेकिन उस वक्त न दे पाने से उसके भीतर उस रिश्ते को लेकर गहरी असुरक्षाएं भी हैं जो एक हद तक शक की दहलीज़ तक जा पहुंचती हैं। जिसके लिये पार्टी का मतलब दोस्त और शराब हैं लेकिन अपने पुरुष दोस्तों से पत्नी की निकटता जिसे असहज करने लगती है। जो अपनी पत्नी से बहुत प्यार करता है पर इसके बावजूद वो उसके पास इतना वक्त नहीं है कि वो अपनी पत्नी की मनोवैज्ञानिक समस्याओं को बिना मनोवैज्ञानिक की मदद से दूर कर पाये।

निक की मां भी एक औरत के रुप में मेबल के व्यवहार को देखने के बजाय उसे सरसरे तौर पर देखती है। उसे लगता है कि मेबल की वजह से निक के बच्चे और निक दोनों की जिन्दगी बुरी तरह से प्रभावित हो रही है। वो मेबल को एक पागल की तरह देखती है जिसे उसके परिवार की बेहतरी के लिये तुरंत घर से निकाल दिया जाना चाहिये।

 

6 महीने बाद जब मेबल अस्पताल से लौटती है तो वो एकदम खामोश है। मेबल के पति, उसकी सास और उसके रिश्तेदारों का उसके लिये जो रवैया है उसे देखकर लगता है कि कई बार सामान्य कहे जाने वाले लोग भी पागलों सी हरकतें करते हैं। सारे लोग मेबल को घेरकर बैठे हैं और उसे घूर रहे हैं ये देखने के लिये कि वो सामान्य बर्ताव करती है कि नहीं। अस्पताल से लौटकर वो सामान्य हुई है कि नहीं। इस एक छोटे से दृश्य में फिल्म ये बखूबी समझा देती है कि मनोवैज्ञानिक रुप से परेशान व्यक्ति को असामान्य बना देने में एक समाज, दोस्त, रिश्तेदारों और यहां तक कि अपने जीवनसाथी के रुप में हम एक सामान्य व्यक्ति की भूमिका में भी कितनी नकारात्मक भूमिका निभा रहे होते हैं।

कैसेवेटस की ये फिल्म बड़े बिम्बों के साथ नहीं खेलती, संवादों और मुख्यतह हावभावों के ज़रिये पूरी फिल्म उतना ही दिखाना चाहती है जितना आप परदे पर देख रहे हैं। कई दृश्य बार बार आते हैं पर उनकी पनरावृत्ति उबाउ कतई नहीं लगती। जितनी बार वो दोहराये जाते हैं आप किरदारों के उतनी नज़दीक पहुंचते चले जाते हैं।

आपको असामान्य व्यवहार करने के बावजूद मेबल अपनी जगह एकदम सही लगती है और समान्य व्यवहार करने के बावजूद आपको उसके पति निक और उसकी सास का व्यवहार असामान्य लगता है। फिल्म की शायद सबसे बड़ी और अहम बात यही है कि फिल्म देखते हुए आप एक असामान्य से लग रहे किरदार के, उसकी भावनाओं के, उसकी ज़रुरतों के, उसकी मजबूरियों के और उसके अन्र्तद्वन्द्ववों की जटिलता के ज्यादा पास खड़े महसूस करते हैं जबकि ऐसा होना आपको असहज ज्यादा करता है। आप एक दर्शक के तौर पर उस असहजता को अपनाने का ज़ोखिम उठाते हैं और यहीं निर्देशक अपने काम में सफल हो जाता है।

जेना रोलेन्ड (Gene rowlands) ने बतौर मेबल बहुत ही शानदार अभिनय किया है। इतना शानदार कि आप पूरी फिल्म के दौरान उस किरदार के नज़रिये से सोचते लगते हैं। उसके अकेलेनप, उसके दर्द और उसके प्यार और कुल मिलाकर उसके पक्ष को गहरे तक समझ पाते हैं और महसूस करने लगते हैं। पीटर फाॅक ( Peter falk) ने भी निक के रुप में अपने किरदार को कही फीका नहीं पड़ने दिया है।

कुलमिलाकर ये फिल्म उन विरली फिल्मों में है जो मनोविज्ञान की जटिलताओं को बहुत आसान सी भाषा में समझा देती है और ये बता देती है कि मनोरोगी को रोगी बनाने में एक समाज, एक रिश्तेदार, एक जीवनसाथी और एक व्यक्ति के रुप में अक्सर हम कहां गलत होते हैं।

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