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उड़ती हुई पतंगें हिन्दू-मुस्लिम कैसे पहचानें

secular

 

 

 

 

 

 

 

बुझने से पहले हर लौ अक्सर लगती है इतराने                                                                                              बनते बनते रह जाते हैं यूं भी दुनिया में अफ़साने

उंगली की स्याही का रंग, नीला होता है, लाल नहीं
याद रहे ये आये हैं हमको बातों में उलझाने

अब भी याद में ताज़ा है अप्पी की सेंवई का मीठापन
होली में वो भी आई थी मेरे घर गुजिया खाने

छत पर साथ खड़े होकर के  ढील दी हमने माझे में
उड़ती हुई पतंगे हिन्दू-मुस्लिम कैसे पहचानें

जो भी जीते, जो भी हारे, इंसानियत का क़त्ल न हो
चंद दिनों के लिए देश को मत देना तुम बंट जाने

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