ताज़ा रेजगारी

उस बच्चे के होंठ में पालथी मार के बैठी थी पागल

Photo By : Umesh Pant

खिड़की पर परदे और दरवाजों पे रहती है सांकल
फिर जाने किस रस्ते से दबे पांव वो गई निकल

सड़कों, चौराहों, बाज़ारो, घर से, दफ्तर से गायब
दिल से, बातों से, चेहरे से, होंठो से भी गई फिसल

इसका, उसका, सबका, चेहरा मुरझाया सा लगा मुझे
कुछ तो था जो सबके अन्दर धीरे-धीरे गया बदल

जब फुर्सत के दिन थे तो चौखट पे ही दिख जाती थी
‘खुशी’ नाम की वो चिड़िया ना जाने कहां हुई ओझल

दिन भर भाग दौड़ कर जाने कहां-कहां खोजी मैंने
आंखिर ट्रेन की सीट के एक कोने पर मैंने देखी कल

मां की गोद में बैठे दुनियाभर की शैतानी करते
उस बच्चे के होंठ में पालथी मार के बैठी थी पागल

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