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उधारी की मौज और परेशानियों की नकदी

मुम्बर्इ में नया नया आया था तो टीवी के एक लेखक से मिलने गया। लोखंडवाला की पौश कौलानी में टूबीएचके लेकर अकेले रहते थे। मतलब ये कि पैसा अच्छा कमाते थे। बातों बातों में उन्होंने बताया जिमिंग, स्वीमिंग, कार जैसे कर्इ नये शौक उन्होंने टीवी की दुनिया में आकर पाल लिये। क्यूंकि अभी पैसा अच्छा मिल रहा था तो र्इएमआर्इ नाम के उस जादुर्इ तरीके ने चीजें आसान कर दी थी। हर महीने कटने वाली इस निर्धारित रकम की मात्रा घर में आने वाली हर नर्इ चीज़ मसलन वाशिंग मशीन, फि्रज, डबल बैड, ड्रैसिंग टेबल वगैरह वगैरह के साथ बढ़ती जली जाती। पैट्रोल की कीमत और कार की मेंटेनेंस सो अलग। ऐसे में रिसते रिसते किश्तें इतनी महंगी हो गर्इ जितनी पिताजी की तनख्वाह हुआ करती थी जिसमें माता जी, पिताजी सहित तीन भार्इ बहनों का परिवार आराम से चल जाता था, और थोड़ी बचत भी हो जाया करती थी। पर साहब को उधारी में जीने की ऐसी लत लगी कि अब महीने में कुछ भी करके इतना कमाना ही है कि किश्तें भरी जा सकें। माने ये कि हर महीने मोटी तनख्वाह का आना लगभग उतना ही जरुरी हो गया है जितना हर पल सांसों का आना।

यही कहानी है बड़े शहरों में रहने वाले लगभग हर दूसरे मिडिल क्लास आदमी की। शहरों का बाज़ार किसी मायाजाल की तरह हमें अपनी ओर खींचता है और इस बाज़ार के गणित का सीधा सीधा समीकरण यही है कि जितना पैसा आप दिनरात की मेहनत करके कमा रहे हो उसको जितनी जल्दी हो सके आपसे खींच लिया जाये। ताकि पूंजी का प्रवाह बेरोकटोक जारी रहे। इस प्रवाह का जारी रहना तब तक तो ठीक है जब तक इसका बुरा असर हमारी जिन्दगी के प्रवाह में ना पड़े। लेकिन मुशिकलें तब खड़ी होती है जब इस प्रवाह को बनाये रखना हमारी मजबूरी बन जाती है। उधारी की जिम्मेदारी हम उठा तो लेते हैं पर ऐसा करते हुए हम उस फंदे को भूल जाते हैं जो इसके एवज में हमारी गरदन पर फिट कर दिया जाता है। और फिर जैसे जैसे आमदनी कम होती जाती है ये फंदा और टार्इट होता चला जाता है।

सुविधापसंद होना कोर्इ गलत बात नहीं है, खासकर तब जबकि आपने अपनी योग्यता के आधार पर सुविधाओं का इस्तेमाल करने की कुव्वत हासिल की हो। लेकिन परेशानी तब होती है जब हम अपनी सुविधाओं की मूलभूत परिभाषा को बाज़ार के हिसाब से या फिर लोगों की देखादेखी बदलने लगते हैं। तथाकथित सोशियल स्टेटस जैसे स्यूडो कौंसेप्टस के झांसे में आकर हम वो सुविधाएं हासिल करने की जुगत में लग जाते हैं जो महंगी हों और दूसरों के पास हों। टीवी और अखबारों में आने वाले विज्ञापन इन झांसों में आने में हमारी मदद करते हैं। ये विज्ञापन पहले दिमाग की बत्ती जलाने जैसी बातें कहकर हमारी अकल का फयूज उड़ा देते हैं, और फिर अपनी अकल लगाने का मशविरा भी देते हैं। ऐसे में इनके हिप्पोक्रेटिक चरित्र को बखूबी समझा जा सकता है।

कहते हैं पांव उतने ही पसारने चाहिये जितनी लम्बी चादर हो। पर ये दौर पुरानी कहावतों को भुला दिये जाने और बाज़ार द्वारा गढ़े गये नये मुहावरों को सर झुकाकर अपना लिये जाने का दौर है। लिव लार्इफ किंग सार्इज़ जैसी पंचलार्इन्स हमें इतना मोह लेती हंै कि फिर अपनी चादर का सार्इज नापने की जे़हमत हम नहीं उठाते। डेबिट और क्रेडिट का अनुलोम-विलोम सीखने के चलते हम जीने की सलाहियत भूल जाते हैं। और अपने आने वाले 5-10 सालों की कुंडली में बिलों की किश्तों को लिख देते हैं, जिन्हें चुकाना हमारी तकदीर में शामिल हो जाता है। और फिर उधारी के बोझ से लदकर वक्त की दीवार पर हमारी जो तस्वीर चस्पा होती है उससे मुस्कुराहट हमेशा हमेशा के लिये गायब जाती है।

आज जब हमारे पास फोन पर लोन ले लेने के इन्तज़ाम मौजूद हैं, हमें बड़ी सावधानी से ज़रुरी और गैरज़रुरी चीज़ों के अन्तर को समझने की ज़रुरत है। ये भी समझना होगा कि ग्लोबल बाज़ार में समाया सुविधाओं का अनन्त हमें कर्जे के बोझ तले रौंद देने की साजिश तो नहीं रच रहा। प्रकि्रति ने वक्त की जो नकदी हमें दी है उसे उधार चुकाने में खर्च कर देना समझदारी तो नहीं है। याद रखियेगा कि कज़ोर्ं की मानसिक दासता में जी गर्इ जि़न्दगी महज क्रेडिट कार्ड स्वैप कर लेने जितनी आसान नहीं होती।

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