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इस ज़िंदगी का कोई निर्देशक नहीं होता

Who let the dog out

 बांद्रा स्टेशन की तरफ आती हुई सड़क। हाथ में कतई लाल रंग के दिल के आकार के 25-30 गुब्बारों का गुच्छा। वो सफेद टाॅप और नीली रंग की जींस पहनी हुई लड़की हाथ में छतरी के हैंडल की तरह एक डोरी थामे पूरे आत्मविश्वास से इस गुच्छे को लिये आगे बढ़ती जा रही थी। चेहरे पर न कोई डर न कोई घबराहट। चैदह फरवरी का दिन और बूढ़े, बच्चे, वयस्कों से भरी एक व्यस्त सड़क।

कुछ देर उसे देखने के बाद आस पास देखा। लड़के, लड़कियां और बुजुर्ग भी इस दृश्य को एक व्यस्त संकरी सड़क के कई आम दृश्यों में से एक दृश्य समझकर बिना ठिठके अपने अपने ठिकानों की तरफ चले जा रहे थे। ठीक उस वक्त एक बात दिमाग में आई। अगर ये जगह दिल्ली होती तो? शायद दिल के आकार के चटख लाल रंग के गुब्बारों को लिये ये लड़की दृश्य में कहीं नहीं होती। होती तो उसके चेहरे पर खिली ये बेपरवाही शायद गायब होती। आस पास के लोगों की नज़र शायद उस पर घूरने की हद तक टिकी होती। मनचलों की फबतियां उसके कानों के किनारे से गुजरती हवा में तेज़ाब की तरह सरसरा रही होती। और कुछ भी हो सकता था, और हो सकता है कुछ भी न होता। दिल के आकार के इन लाल गुब्बारों ने एक पल के लिये मुम्बई की कद्र दिल में और बढ़ा दी। प्यार का एक दिन मुकर्रर होना भले ही प्यार में इज़ाफा न करता हो पर उस दिन प्यार के प्रतीकों को बेखौफ आत्मसात कर लेने की सुविधा मिलना एक शहर के लिये आपके अपनापे को ज़रुर बढ़ा देता है।

अभी अभी एक राष्ट्रीय समाचार चैनल पर जीतेन्द्र नाम के उस साधारण से दिखने वाले लड़के को इन्टरव्यू देते सुना। जिसने उस साधारण से दिखने वाले आदमी का अभिनय किया था जो ऐसे ही आम आदमी, आम आदमी का खेल खेलकर मुख्यमंत्री बन गया। अपनी एक साधारण सी टीम के बनाये उस स्पूफ के जरिये जिसने देशभर में पहचान पा ली। उसकी टीम जिसने चूतियापे को क्यूटियापे के कलेवर में पेश करके लाखों फैन्स बना लिये। अपने ही सामने साधारण से लोगों के असाधारण से सपनों को बड़ा होते हुआ देखना, आम लोगों को खास पहचान पाते हुए देखना, यकीन मानिये एक साधारण अनुभव नहीं होता।

ठीक दो दिन पहले यही लोग अंधेरी के एक छोटे से हाॅल में जिसे आॅडिटोरियम कहना अतिश्योक्ति की तरह होगा, एक शो कर रहे थे। तकरीबन 60-70 लोगों के बैठने की क्षमता वाले उस छोटे से कमरे में क्यूटियापा की टीम के लोग हू लैट द डाॅग आउट नाम का एक प्ले कर रहे थे। उस प्ले में काम करने वाले तकरीबन सभी लोगों के चेहरे यू ट्यूब और सोशियल मीडिया में नज़र रखने वाले लोगों के लिये अनभिज्ञ नहीं थे। हू लेट द डाॅग आउट नाम के इस प्ले का न टाइटल आॅरिजनल था, न ही उस प्ले का मूल ढ़ांचा पर जो चीज उस प्ले को देखने लायक बना रही थी वो ये कि प्ले में कोई कहानी ही नहीं थी, उसका कोई एक प्लाॅट नहीं था, उसके किरदारों का कोई एक ग्राफ नहीं था, उस प्ले की कोई एक मुकम्मल शुरुआत नहीं थी, न ही उसका कोई एक निर्धारित अंत था। वो कभी भी शुरु और कभी भी खत्म हो सकता था। ठीक वैसे जैसे जिन्दगी।

उस प्ले के किरदारों की विडंबना भी यही थी कि ये किसी को भी नहीं पता कि उस प्ले का निर्देशक कौन है ? ठीक वैसा जैसा जिन्दगी में होता है। हर मोड़ पे कोई नया किरदार आता है और जिन्दगी को एक दिशा देने लगता है, तब पता चलता कि दरअसल अब तक जो घटनाएं हो रही थी वो घटनाएं इसी निर्देशन के लिये हो रही थी। पर कुछ ही देर में पता चलता है कि ये एक भ्रम था और आगे जो घटनाएं होगी उनको निर्देशित करने वाला कोई और होगा, पर कौन, ये कोई पता नहीं लगा सकता। हर आदमी जो खुद को आपकी जिन्दगी के उस हिस्से का निर्देशक कह रहा है दरअसल वो पूरी जिन्दगी में एक छोटा सा किरदार भर है। हम दरअसल एक ही जिन्दगी में कई सारी ऐसी कहानियों के पात्र बन जाते हैं जिनकी न कोई ठीक-ठीक शुरुआत होती है न कोई ठीक-ठीक अंत। इस प्ले का मुख्य कथानक अगर कुछ था तो शायद यही था।

प्ले में किरदार एक ऐसी कहानी की रिहर्सल कर रहे हैं जिसके पात्र वो असल जिन्दगी में भी खुद ही हैं। इस प्ले को देखना दरअसल अपनी जिन्दगी जीते हुए लोगों को उसी जिन्दगी की रिहर्सल करते हुए देखने जैसा अनुभव है।

निधि बिष्ट (जिनको आॅनलाईन गलियों में घूमने फिरने का शौकीन देश का एक बड़ा हिस्सा अब शायद मीनाक्षी लेखिका के नाम से भी जानता होगा) और (अर्जुन केजरीवाल के रुप में पहचान बनाने वाले) जितेन्द्र कुमार ने क्यूटियापा के स्पूफ बाॅलिवुड आम आदमी पार्टी में किये अपने शानदार अभिनय को इस प्ले में भी दोहराया। निधि सिंह, आकांक्षा ठाकुर, कैरव शर्मा ये सारे किरदार, बिना कहानी के इस प्ले को तकरीबन एक घंटे तक देखने लायक बनाने की मुहिम में कामयाब रहे।

प्ले में कहीं टीवी के सीरियल्स की कहानियों पर चुटकी थी, तो कहीं पुराने हिन्दी फिल्मी गानों की अदाकारी के स्पूफ के जरिये हंसाने की लगभग कामयाब हो गई सी कोशिश। इन बातों के साथ छोटे से मंच पर इस प्ले के जरिये एक और बड़ी बात जो कही गई वो ये थी कि किस तरह मुम्बई जैसे बड़े शहर में रंगमंच जैसी पुरानी विधा से जुड़ने वाले लोग दरअसल वो नहीं हैं जो रंगमंच को एक कला के रुप में देखते हैं। इनमें से ज्यादातर वो लोग हैं जो एक्टिंग करना चाहते हैं पर जिन्हें फिल्मों या टीवी में शायद काम ही नहीं मिला इसलिये वो रंगमंच से जुड गये। एक कटाक्ष उन लोगों पर जिन्हें रंगमंच की कोई समझ नही है, ये उनके लिये बस फैशन की तरह है। हांलाकि थियेटर के लिये पागलों की तरह समर्पित लोगों की भी एक ठीकठाक तादात आज भी हमारे देश में शायद है पर वो तादात बहुत तेजी से कम हो रही है।

ये प्ले भले ही एक रंगमंचीय प्रदर्शन की कसौटी में कसने पर उतना खरा न उतरता हो पर इस प्ले में जुटी 60-70 लोगों की भीड़ को दरअसल एक नया टेंªड सेट करने की तरह से देखा जा सकता है। कैसे आॅनलाइन मीडिया के ज़रिये एक अनजान क्रियेटिव नौजवानों का समूह पहले अपनी पहचान बनाता है और फिर जब वो आॅफलाइन दुनिया में लोगों के बीच लाइव जाता है तो लोग उसे कैसे हाथों हाथ लेते हैं। छोटी सी शुरुआत करके बड़े से सपने देखने का माद्दा रखने वाले लोगों के लिये एक उम्मीद जताता सा एक प्ले। उम्मीद है कि ऐसी कोशिशें बड़े फलक में और बेहतर प्रस्तुतिकरण के साथ आगे भी देखने को मिलती रहेंगी और इस मुम्बई डायरी के पन्नों में शामिल होती रहेंगी।

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